Daṇḍa-svarūpa-nirūpaṇa
The Nature, Forms, and Function of Daṇḍa
आपद्द्वारेषु युक्त: स्याज्जलप्रस्रवणेष्विव । शैलवर्षोदकानीव द्विजान् सिद्धान् समाश्रयेत् । अर्थकाम: शिखां राजा कुर्याद्धर्मध्वजोपमाम्,बाढ़के समय जिस ओरसे जल बहकर गाँवोंको डुबा देनेका संकट उपस्थित कर दे, उस स्थानपर जैसे लोग मजबूत बाँध बाँध देते हैं, उसी प्रकार जिन द्वारोंसे संकट आनेकी सम्भावना हो, उन्हें सुदृढ़ बनाने और बंद करनेके लिये राजाको सतत सावधान रहना चाहिये। जैसे पर्वतोंपर वर्षा होनेसे जो पानी एकत्र होकर नदी या तालाबके रूपमें रहता है, उसका उपयोग करनेके लिये लोग उसका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार राजाको सिद्ध ब्राह्मणोंका आश्रय लेना चाहिये तथा जिस प्रकार धर्मका ढोंगी सिरपर जटा धारण करता है, उसी तरह राजाको भी अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी इच्छासे उच्च लक्षणोंको धारण करना चाहिये
āpad-dvāreṣu yuktaḥ syāj jala-prasravaṇeṣv iva | śaila-varṣodakānīva dvijān siddhān samāśrayet | artha-kāmaḥ śikhāṁ rājā kuryād dharma-dhvajopamām ||
ภีษมะกล่าวว่า—พระราชาพึงระวังอยู่เสมอ ณ ‘ประตู’ ที่ภัยพิบัติอาจบุกเข้ามาได้ ดุจผู้คนเสริมคันกั้นน้ำ ณ จุดที่น้ำอาจทะลัก. และดุจผู้คนอาศัยน้ำที่สั่งสมจากฝนบนภูเขา พระราชาพึงอาศัยบรรดาพราหมณ์ผู้สำเร็จ (สิทธะ). อนึ่ง ด้วยความใคร่ในประโยชน์ พระราชาบางคราวอาจถือเอาเครื่องหมายแห่งคุณธรรมภายนอก เพื่อให้กิจของตนสำเร็จ—ดุจคนหน้าซื่อใจคดชูชิกา (มวยผม) เป็นธงแห่ง ‘ธรรม’.
भीष्म उवाच