Jaitrya-nimitta: Signs of Prospective Victory and the Priority of Conciliation (जयलक्षण-निमित्त तथा सान्त्व-प्रधान नीति)
अहो जीवितमाकाडुक्षेन्नेद्शो वधमर्हति । सुदुर्लभा: सुपुरुषा: संग्रामेष्वपलायिन:,“अहो! सभी लोग अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं; अतः ऐसे पुरुषका वध करना उचित नहीं है। संग्राममें पीठ न दिखानेवाले सत्पुरुष इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ हैं। मेरे जिन सैनिकोंने युद्धमें इस श्रेष्ठ वीरका वध किया है, उनके द्वारा मेरा बड़ा अप्रिय कार्य हुआ है। शत्रुपक्षके सामने वाणीद्वारा इस प्रकार खेद प्रकट करके राजा एकान्तमें जानेपर अपने उन बहादुर सिपाहियोंकी प्रशंसा करे, जिन्होंने शत्रुपक्षके प्रमुख वीरोंका वध किया हो
aho jīvitam ākāṅkṣen nedṛśo vadham arhati | sudurlabhāḥ supuruṣāḥ saṅgrāmeṣv apalāyinaḥ ||
“อนิจจา! สรรพสัตว์ทั้งปวงย่อมปรารถนาจะรักษาชีวิตไว้ ฉะนั้นบุรุษเช่นนี้ไม่สมควรถูกฆ่า และผู้ประเสริฐที่ไม่หันหลังให้สนามรบนั้น หาได้ยากยิ่งในโลกนี้”
भीष्म उवाच