Kapālamocana-tīrtha (Auśanasa) and Balarāma’s Sarasvatī Pilgrimage
न तस्य दुर्लभ किज्चिद् भवितेह परत्र वा । सारस्वतं च ते लोक॑ गमिष्यन्ति न संशय:,यह सुनकर महादेवजीका मन प्रसन्न हो गया। वे उन महर्षिसे पुनः बोले--“विप्रवर! मेरे प्रसादसे तुम्हारी तपस्या सहख्रगुनी बढ़ जाय। मैं इस आश्रममें सदा तुम्हारे साथ निवास करूँगा। जो इस सप्तसारस्वततीर्थमें मेरी पूजा करेगा, उसके लिये इहलोक या परलोकमें कुछ भी दुर्लभ न होगा। वे सारस्वत लोकमें जायँगे--इसमें संशय नहीं है”
na tasya durlabha kiñcid bhaviteha paratra vā | sārasvataṃ ca te lokaṃ gamiṣyanti na saṃśayaḥ ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า “ผู้ใดบูชาที่นั่น ย่อมไม่มีสิ่งใดเอื้อมไม่ถึง ทั้งในโลกนี้หรือโลกหน้า และเขาทั้งหลายจักไปถึงแดนสารัสวตะโดยแท้—ปราศจากข้อสงสัย”
वैशम्पायन उवाच