Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
भीमोग्रपरिघालातशूलपट्टिशपाणय: । घोररूपा: समाजम्मुर्भूतसड्घा: समन्तत:,भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे
sañjaya uvāca |
bhīmogra-parighālāta-śūla-paṭṭiśa-pāṇayaḥ |
ghora-rūpāḥ samājam mur bhūta-saṅghāḥ samantataḥ ||
หมู่ภูตผู้มีรูปอันน่าสะพรึงมาชุมนุมจากทุกทิศ มือของพวกเขาถืออาวุธอันดุดัน—กระบองเหล็กหนัก คบเพลิงเพลิงลุก ตรีศูล และขวานศึก
संजय उवाच