
Chapter 14: Divyāstra-Prayoga and Ṛṣi Intervention (दिव्यास्त्रप्रयोगः ऋषिसमागमश्च)
Upa-parva: Astra-Śamana (Pacification of the Divine Weapons) Episode
Vaiśaṃpāyana reports that Kṛṣṇa, reading the situation through signs, addresses Arjuna and instructs him to deploy the divine weapon residing ‘in his heart’—the one taught by Droṇa—specifically for the protection of his brothers and himself, as an astranivāraṇa countermeasure. Arjuna dismounts swiftly with Gāṇḍīva readied, offers formal assurances and salutations (to deities and gurus), and releases the weapon while meditating on Śiva, explicitly aiming to neutralize weapon-force with weapon-force. The two weapons—Arjuna’s and Droṇa’s son’s—ignite with apocalyptic radiance, producing thunderous sounds, meteor falls, fear among beings, and tremors across the earth. At the height of this destabilization, two sages—Nārada and the dharmic pitāmaha of the Bharatas—appear between the blazing energies, positioned as impartial stabilizers seeking the welfare of all beings, and begin to address the unprecedented nature of such weapon deployment among humans.
Chapter Arc: अश्वत्थामा के उन्मत्त, विनाशकारी संकल्प को श्रीकृष्ण पहले ही भाँप लेते हैं और अर्जुन को संकेत देते हैं कि अब केवल साधारण शस्त्र नहीं—अस्त्र-निवारक ब्रह्मास्त्र ही प्राण-रक्षा का उपाय है। → कृष्ण के वचन पर अर्जुन अपने आचार्यपुत्र (अश्वत्थामा) और स्वयं तथा समस्त भाइयों की रक्षा हेतु ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं; गाण्डीव से छूटा तेज युगान्त-अग्नि-सा प्रज्वलित होता है, आकाश में उल्कापात और वज्र-नाद जैसे निर्घात होने लगते हैं, और समस्त प्राणियों में महाभय व्याप्त हो जाता है। → दोनों ओर के ब्रह्मास्त्रों का तेज लोकों को संतप्त करने लगता है; तभी सर्वधर्मज्ञ, सर्वभूतहितैषी महर्षि वेदव्यास और देवर्षि नारद उन दीप्त अस्त्रों के मध्य प्रकट होकर इस महात्यय को रोकने के लिए खड़े होते हैं और दोनों वीरों को धिक्कारते हुए कहते हैं कि मनुष्यों में ऐसा अस्त्र-प्रयोग पूर्व महरथियों ने भी नहीं किया—यह साहस विनाश का द्वार है। → व्यास-नारद लोकहित के लिए अस्त्र-तेज शमन का उपदेश देते हैं—युद्ध-क्रोध को धर्म-बुद्धि से बाँधते हैं और संकेत करते हैं कि ब्रह्मास्त्र का मार्ग ‘विजय’ नहीं, ‘प्रलय’ है; अध्याय का स्वर अस्त्र-निवारण की ओर मुड़ता है। → अस्त्रों का तेज अभी भी दहक रहा है—अब प्रश्न यह है कि कौन अपने अस्त्र को वापस ले सकेगा, और जो न लौटा सका उसका दण्ड किस रूप में प्रकट होगा?
Verse 1
अप ह बछ। ] अत्ऑकाए:<ह चतुर्दशो 5 ध्याय: अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण करनेके लिये अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग एवं वेदव्यासजी और देवर्षि नारदका प्रकट होना वैशम्पायन उवाच इड्धितेनैव दाशा्हस्तमभिप्रायमादित: । द्रौणे्बुदध्वा महाबाहुरर्जुन॑ प्रत्यभाषत
ไวศัมปายนะกล่าวว่า ครั้นมหาพาหุอรชุนหยั่งรู้เจตนาแห่งการกระทำของอัศวัตถามาได้ชัดเจนตั้งแต่ต้นแล้ว จึงกล่าวกับเขาโดยตรง
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! दशार्हनन्दन महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अश्व॒ृत्थामाकी चेष्टासे ही उसके मनका भाव पहले ही ताड़ गये थे। उन्होंने अर्जुनसे कहा -- || अश्वत्थामा एवं अर्जुनके छोड़े हुए ब्रह्मास्त्रोंको शान्त करनेके लिये नारदजी और व्यासजीका आगमन अर्जुनार्जुन यदिव्यमस्त्र ते हृदि वर्तते । द्रोणोपदिष्टं तस्थायं काल: सम्प्रति पाण्डव,“अर्जुन! अर्जुन! पाण्डुनन्दन! आचार्य द्रोणका उपदेश किया हुआ जो दिव्य अस्त्र तुम्हारे हृदयमें विद्यमान है, उसके प्रयोगका अब यह समय आ गया है
ไวศัมปายนะกล่าวว่า ข้าแต่พระราชา พระศรีกฤษณะผู้เป็นที่ชื่นใจแห่งวงศ์ทศารหะ ผู้มีพาหาอันเกรียงไกร ได้หยั่งรู้เจตนาและสภาพจิตของอัศวัตถามาแต่ก่อนแล้วจากกิริยาของเขา ครั้นแล้วจึงตรัสแก่อรชุนว่า “อรชุน! อรชุน! โอรสแห่งปาณฑุ! อาวุธทิพย์ที่อาจารย์โทรณะได้ถ่ายทอดแก่เจ้า ซึ่งสถิตอยู่ในดวงหทัย—บัดนี้ถึงกาลที่จะใช้มันแล้ว”
Verse 3
भ्रातृणामात्मनश्वैव परित्राणाय भारत | विसृजैतत् त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम्,“भरतनन्दन! भाइयोंकी और अपनी रक्षाके लिये तुम भी युद्धमें इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो। अभश्व॒त्थामाके अस्त्रका निवारण इसीके द्वारा हो सकता है”
โอเชื้อสายแห่งภารตะ! เพื่อคุ้มครองพี่น้องและตนเอง เจ้าจงปล่อยอาวุธนี้ในสนามรบด้วย—นี่คืออาวุธโต้ตอบที่สามารถสยบอาวุธซึ่งพุ่งเข้ามาได้
Verse 4
केशवेनैवमुक्तो5थ पाण्डव: परवीरहा । अवातरद् रथात् तूर्ण प्रगृह्ा सशरं धनु:,भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन धनुष- बाण हाथमें लेकर तुरंत ही रथसे नीचे उतर गये
เมื่อเกศวะตรัสดังนั้น อรชุนผู้เป็นปาณฑพะ ผู้ปราบวีรชนฝ่ายศัตรู ก็รีบลงจากรถศึก พลางคว้าคันธนูพร้อมลูกศรไว้ในมือ
Verse 5
पूर्वमाचार्यपुत्राय ततो5नन्तरमात्मने । भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्य: स्वस्तीत्युक्त्वा परंतप:,शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि “आचार्यपुत्रका कल्याण हो'। तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल-कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया। इसके बाद “इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया
อรชุนผู้เผาผลาญศัตรูได้กล่าวคำว่า “สวัสดิ” ก่อนเพื่อความผาสุกแก่บุตรแห่งอาจารย์ ต่อมาจึงเพื่อแก่ตนเอง และแล้วเพื่อพี่น้องทั้งปวง
Verse 6
देवताभ्यो नमस्कृत्य गुरुभ्यश्चैव सर्वश: । उत्ससर्ज शिवं ध्यायन्नस्त्रमस्त्रेण शाम्पताम्,शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि “आचार्यपुत्रका कल्याण हो'। तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल-कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया। इसके बाद “इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया
ครั้นนอบน้อมแด่เทพทั้งหลายและบรรดาครูอาจารย์โดยทั่วแล้ว เขาก็ปล่อยอาวุธทิพย์ พลางเพ่งภาวนาในสิริมงคล ตั้งจิตว่า “ขอให้อาวุธของศัตรูสงบลงด้วยอาวุธของเรา”
Verse 7
ततस्तदस्त्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्चना । प्रजज्वाल महार्चिष्मद् युगान्तानलसंनिभम्,गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा छोड़ा गया वह ब्रह्मास्त्र सहसा प्रज्वलित हो उठा। उससे प्रलयाग्निके समान बड़ी-बड़ी लपटें उठने लगीं
แล้วอาวุธนั้นซึ่งผู้ถือคันธนูกาณฑีวะปล่อยออกไป ก็พลันลุกโพลงขึ้นทันที เปล่งเปลวเพลิงใหญ่ดุจไฟแห่งกัลปาวสาน
Verse 8
तथैव द्रोणपुत्रस्य तदस्त्र॑ तिग्मतेजस: । प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम्,इसी प्रकार प्रचण्ड तेजस्वी द्रोणपुत्रका वह अस्त्र भी तेजोमण्डलसे घिरकर बड़ी-बड़ी ज्वालाओंके साथ जलने लगा
ฉันนั้นเอง อาวุธอันน่าสะพรึงของโอรสทโรวณะ ผู้มีรัศมีคมกล้า ก็ลุกโพลงขึ้น ถูกห้อมล้อมด้วยวงแสง และพ่นเปลวไฟใหญ่โตเป็นพวง ๆ
Verse 9
निर्घाता बहवश्चासन् पेतुरुल्का: सहस्रशः । महद् भयं च भूतानां सर्वेषां समजायत,उस समय बारंबार वज्रपातके समान शब्द होने लगे, आकाशसे सहस्रों उल्काएँ टूट- टूटकर गिरने लगीं और समस्त प्राणियोंपर महान् भय छा गया
ครานั้นเสียงครืนครั่นดุจสายฟ้าฟาดกึกก้องซ้ำแล้วซ้ำเล่า อุกกาบาตนับพันตกแตกกระจายจากฟากฟ้า และความหวาดกลัวใหญ่หลวงก็ครอบงำสรรพสัตว์ทั้งปวง
Verse 10
सशब्दम भवद् व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम् | चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा,सारा आकाश आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे व्याप्त हो उठा और वहाँ जोर-जोरसे शब्द होने लगा। पर्वत, वन, और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी हिलने लगी
ท้องฟ้ากึกก้องด้วยเสียงอัปมงคล และแน่นขนัดด้วยพวงมาลัยแห่งเปลวเพลิงอันดุร้าย ทั้งแผ่นดินพร้อมด้วยภูเขา ป่า และหมู่ไม้ ก็สั่นสะเทือน
Verse 11
ते त्वस्त्रतेजसी लोकांस्तापयन्ती व्यवस्थिते । महर्षी सहितौ तत्र दर्शयामासतुस्तदा
ทั้งสองยืนมั่นอยู่ ณ ที่นั้น เปล่งพลานุภาพแห่งอาวุธเผาผลาญโลกทั้งหลาย ครั้นแล้ว ณ ที่เดียวกันนั้น มหาฤๅษีทั้งสองก็ปรากฏองค์พร้อมกัน
Verse 12
उभौ शमयितुं वीरौ भारद्वाजधनंजयौ,सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी वे दोनों परम तेजस्वी मुनि अश्वत्थामा और अर्जुन--इन दोनों वीरोंको शान्त करनेके लिये इनके प्रज्वलित अस्त्रोंके बीचमें खड़े हो गये
เพื่อระงับวีรบุรุษทั้งสอง—โอรสแห่งภารทวาชะคืออัศวัตถามา และธนัญชัยคืออรชุน—มหาฤๅษีผู้รุ่งเรืองยิ่งทั้งสอง ผู้รู้ธรรมนครบถ้วนและมุ่งประโยชน์แก่สรรพสัตว์ ได้ยืนคั่นอยู่ท่ามกลางอาวุธที่กำลังลุกโพลงของทั้งคู่
Verse 13
तौ मुनी सर्वधर्मज्ञौ सर्वभूतहितैषिणौ । दीप्तयोरस्त्रयोर्म ध्ये स्थितो परमतेजसौ,सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी वे दोनों परम तेजस्वी मुनि अश्वत्थामा और अर्जुन--इन दोनों वीरोंको शान्त करनेके लिये इनके प्रज्वलित अस्त्रोंके बीचमें खड़े हो गये
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—ฤๅษีผู้รุ่งเรืองยิ่งทั้งสอง ผู้รู้ทั่วถึงธรรมทั้งปวงและมุ่งประโยชน์แก่สรรพสัตว์ ได้ยืนคั่นอยู่ท่ามกลางอาวุธทิพย์สองสายที่ลุกโพลง เปล่งรัศมีอันยิ่งใหญ่ เพื่อระงับสองวีรบุรุษ คือ อัศวัตถามาและอรชุน
Verse 14
तदन्तरमथाधृष्यावुपगम्य यशस्विनौ । आस्तामृषिवरीौ तत्र ज्वलिताविव पावकौ,उन अस्त्रोंके बीचमें आकर वे दुर्धर्ष एवं यशस्वी महर्षिप्रवर दो प्रज्वलित अग्नियोंके समान वहाँ स्थित हो गये इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अर्जुनास्त्रत्यागे चतुर्दशो5ध्याय: ।। १४ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अर्जुनिके द्वारा ब्रह्मास्रका प्रयोगविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
ครั้นแล้ว ในห้วงคั่นอันน่าหวาดหวั่นนั้น ฤๅษีผู้ประเสริฐทั้งสอง ผู้มิอาจต้านทานและทรงเกียรติ ได้ก้าวเข้าไปยืน ณ ที่นั้น—ดุจไฟสองกองที่ลุกโชติช่วง
Verse 15
प्राणभृद्धिरनाधृष्यौ देवदानवसम्मतौ । अस्त्रतेज: शमयितुं लोकानां हितकाम्यया,कोई भी प्राणी उन दोनोंका तिरस्कार नहीं कर सकता था। देवता और दानव दोनों ही उनका सम्मान करते थे। वे समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन अस्त्रोंके तेजको शान्त करानेके लिये वहाँ आये थे
ท่านทั้งสองเป็นผู้พิทักษ์ชีวิต มิอาจผู้ใดข่มได้ และเป็นที่เคารพของทั้งเทวะและทานวะ ด้วยความปรารถนาประโยชน์แก่สรรพโลก จึงมาที่นั่นเพื่อระงับเดชแห่งอาวุธทิพย์นั้น
Verse 16
ऋषी ऊचतुः नानाशस्त्रविद: पूर्वे येडप्यतीता महारथा: । नैतदस्त्रं मनुष्येषु तैः प्रयुक्ते कथंचन । किमिदं साहसं वीरी कृतवन्तौ महात्ययम्,उन दोनों ऋषियोंने उन दोनों वीरोंसे कहा--“वीरो! पूर्वकालमें भी जो बहुत-से महारथी हो चुके हैं, वे नाना प्रकारके शस्त्रोंके जानकार थे, परंतु उन्होंने किसी प्रकार भी मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं किया था। तुम दोनोंने यह महान् विनाशकारी दुःसाहस क्यों किया है?
ฤๅษีทั้งสองกล่าวว่า—“โอ้เหล่าวีรบุรุษ! แม้ในกาลก่อนก็มีมหารถีมากมาย ผู้ชำนาญอาวุธนานาประการ แต่ไม่เคยมีผู้ใดนำอาวุธนี้ไปใช้กับมนุษย์ไม่ว่าในกรณีใด เหตุไฉนพวกท่านทั้งสองจึงกระทำความหาญกล้าอันบันดาลมหาวินาศเช่นนี้?”
Verse 116
नारद: सर्वभूतात्मा भरतानां पितामह: । उन दोनों अस्त्रोंक तेज समस्त लोकोंको संतप्त करते हुए वहाँ स्थित हो गये। उस समय वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा नारद तथा भरतवंशके पितामह व्यास--इन दो महर्षियोंने एक साथ दर्शन दिया
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—เมื่อเดชอันลุกโพลงของอาวุธทิพย์ทั้งสองแผดเผาสรรพโลกอยู่ ณ ที่นั้น ในกาลนั้นเอง นารทผู้ได้ชื่อว่าเป็นดวงวิญญาณแห่งสรรพสัตว์ และวยาส ปิตามหะแห่งวงศ์ภารตะ—มหาฤๅษีทั้งสองได้ปรากฏพร้อมกัน
Whether countering a catastrophic divyāstra with another divyāstra can be justified for protection without triggering uncontrolled harm to the wider world-order.
Force must be deployed with explicit protective intent, procedural discipline (salutations, dhyāna), and an orientation toward neutralization rather than vengeance.
Yes—ṛṣi intervention functions as an epic-level governance mechanism, indicating that supra-human technologies (divyāstras) require higher ethical arbitration when human conflict threatens collective existence.