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Shloka 36

ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ।। (धृतराष्ट उवाच किमनब्रुवन्‌ नागरिका: कि वै जानपदा जना: । महां तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्त: सर्वमशेषत: ।। धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ। विदुर उवाच ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा येडन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ।। विदुर बोले--महाराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्यलोग इस घटनाके सम्बन्धमें जो कुछ कहते हैं, वह सुनिये, मैं आपसे सब बातें बता रहा हूँ। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम्‌ । इति पौरा: सुदुःखार्ता: शोचन्ति सम समन्तत: ।। पाण्डवोंके जाते समय समस्त पुरवासी दुःखसे आतुर हो सब ओर शोकमें डूबे हुए थे और इस प्रकार कह रहे थे--'हाय! हाय! हमारे स्वामी, हमारे रक्षक वनमें चले जा रहे हैं। भाइयो! देखो, धृतराष्ट्रके पुत्रोंका यह कैसा अन्याय है?! तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत्‌ | नगर हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम्‌ ।। स्‍त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्षरहित, शब्दशून्य तथा उत्सवहीन-सा हो गया। सर्वे चासन्‌ निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा ।। पार्थात्‌ प्रति नरा नित्यं चिनन्‍्ताशोकपरायणा: । तत्र तत्र कथां चक्कर: समासाद्य परस्परम्‌ ।। सब लोग दुन्तीपुत्रोंके लिये निरन्तर चिन्ता एवं शोकमें निमग्न हो उत्साह खो बैठे थे। सबकी दशा रोगियोंके समान हो गयी थी। सब एक-दूसरेसे मिलकर जहाँ-तहाँ पाण्डवोंके विषयमें ही वार्तालाप करते थे। वन॑ गते धर्मराजे दुः:खशोकपरायणा: । बभूवु: कौरवा वृद्धा भृशं॑ शोकेन पीडिता: ।। धर्मराजके वनमें चले जानेपर समस्त वृद्ध कौरव भी अत्यन्त शोकसे व्यथित हो दुःख और चिन्तामें निमग्न हो गये। ततः पौरजन: सर्व: शोचन्नास्ते जनाधिपम्‌ | कुर्वाणाश्व कथास्तत्र ब्राह्मणा: पार्थिवं प्रति ।। तदनन्तर समस्त पुरवासी राजा युधिष्ठटिरके लिये शोकाकुल हो गये। उस समय वहाँ ब्राह्मणलोग राजा युधिष्ठिरके विषयमें निम्नांकित बातें करने लगे। ब्राह्मणा ऊचु कथं नु राजा धर्मात्मा वने वसति निर्जने । तस्यानुजाश्च ते नित्यं कृष्णा च द्रुपदात्मजा ।। सुखाहापि च दु:ःखारता कथं वसति सा वने ।। ब्राह्मणोंने कहा--हाय! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर और उनके भाई निर्जन वनमें कैसे रहेंगे? तथा ट्रुपदकुमारी कृष्णा तो सुख भोगनेके ही योग्य है, वह दुःखसे आतुर हो वनमें कैसे रहेगी। विदुर उवाच एवं पौराश्न विप्राश्न॒ सदारा: सहपुत्रका: | स्मरन्त: पाण्डवान्‌ सर्वे बभूवुर्भशदु:खिता: ।। विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पुरवासी ब्राह्मण अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बहुत दुःखी हो गये। आविद्धा इव शस्त्रेण नाभ्यनन्दन्‌ कथंचन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न कंचित्‌ प्रत्यपूजयन्‌ ।। शस्त्रोंक आघातसे घायल हुए मनुष्योंकी भाँति वे किसी प्रकार सुखी न हो सके। बात कहनेपर भी वे किसीको आदरपूर्वक उत्तर नहीं देते थे। न भुक्‍्त्वा न शयित्वा ते दिवा वा यदि वा निशि | शोकोपहततविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन्‌ ।। उन्होंने दिन अथवा रातमें न तो भोजन किया और न नींद ही ली; शोकके कारण उनका सारा विज्ञान आच्छादित हो गया था। वे सब-के-सब अचेत-से हो रहे थे। यदवस्था बभूवार्ता हायोध्या नगरी पुरा । रामे वन॑ गते दुःखादूधृतराज्ये सलक्ष्मणे ।। तदवस्थं बभूवार्तमद्येदं गजसाह्वयम्‌ । गते पार्थे वनं दुःखादूधृतराज्ये सहानुजै: ।। जैसे त्रेतायुगमें राज्यका अपहरण हो जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेके बाद अयोध्या नगरी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो बड़ी दुरवस्थाको पहुँच गयी थी, वही दशा राज्यके अपहरण हो जानेपर भाइयोंसहित युधिष्ठिरके वनमें चले जानेसे आज हमारे इस हस्तिनापुरकी हो गयी है। वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वच: श्रुत्वा नागरस्य गिरं च वै । भूयो मुमोह शोकाच्च धृतराष्ट्र: सबान्धव: ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! विदुरका कथन और पुरवासियोंकी कही हुई बातें सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित राजा धृतराष्ट्र पुन: शोकसे मूर्च्छित हो गये। ततो दुर्योधन: कर्ण: शकुनिश्चापि सौबल: । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्‍न्यवेदयन्‌,तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिने द्रोणको अपना द्वीप (आश्रय) माना और सम्पूर्ण राज्य उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया

vaiśaṃpāyana uvāca |

vidurasya vacaḥ śrutvā nāgarasya giraṃ ca vai |

bhūyo mumūha śokāc ca dhṛtarāṣṭraḥ sabāndhavaḥ ||

tato duryodhanaḥ karṇaḥ śakuniś cāpi saubalaḥ |

droṇaṃ dvīpam amanyanta rājyaṃ cāsmai nyavedayan ||

ไวศัมปายนะกล่าวว่า—ครั้นได้ฟังถ้อยคำของวิทุระและเสียงคร่ำครวญของชาวนครแล้ว ธฤตราษฏระพร้อมด้วยญาติวงศ์ก็ตกอยู่ในความหลงมัวเพราะโศกาอีกครั้งหนึ่ง. แล้วทุรโยธนะ กรรณะ และศกุนิ บุตรแห่งสุพละ ถือเอาโทรณะเป็น ‘เกาะ’ ของตน—คือที่พึ่งอันมั่นคง—และถวายราชอาณาจักรไว้แทบเท้าท่าน มอบอำนาจให้ท่านดูแล.

ततःthen/thereupon
ततः:
TypeIndeclinable
Rootततः
दुर्योधनःDuryodhana
दुर्योधनः:
Karta
TypeNoun
Rootदुर्योधन
FormMasculine, Nominative, Singular
कर्णःKarna
कर्णः:
Karta
TypeNoun
Rootकर्ण
FormMasculine, Nominative, Singular
शकुनिःShakuni
शकुनिः:
Karta
TypeNoun
Rootशकुनि
FormMasculine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
अपिalso/even
अपि:
TypeIndeclinable
Rootअपि
सौबलःson of Subala (Saubala)
सौबलः:
Karta
TypeAdjective
Rootसौबल
FormMasculine, Nominative, Singular
द्रोणम्Drona
द्रोणम्:
Karma
TypeNoun
Rootद्रोण
FormMasculine, Accusative, Singular
द्वीपम्island; (fig.) refuge/support
द्वीपम्:
Karma
TypeNoun
Rootद्वीप
FormMasculine, Accusative, Singular
अमन्यन्तthey considered/thought
अमन्यन्त:
TypeVerb
Rootमन्
FormImperfect (Laṅ), Third, Plural, Ātmanepada
राज्यम्kingdom, sovereignty
राज्यम्:
Karma
TypeNoun
Rootराज्य
FormNeuter, Accusative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
अस्मैto him
अस्मै:
Sampradana
TypePronoun
Rootअस्मद्
FormDative, Singular
न्यवेदयन्they offered/presented (formally conveyed)
न्यवेदयन्:
TypeVerb
Rootविद् (√विद्/वेद्) with नि-
FormImperfect (Laṅ), Third, Plural, Parasmaipada

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśaṃpāyana
V
Vidura
D
Dhṛtarāṣṭra
N
Nāgarāḥ (citizens of Hastināpura)
D
Duryodhana
K
Karṇa
Ś
Śakuni (Saubala, son of Subala)
D
Droṇa
R
Rājya (the kingdom)

Educational Q&A

Public conscience recognizes adharma: the citizens’ lament and Dhṛtarāṣṭra’s grief show an awareness that injustice has been done to the Pāṇḍavas. Yet the Kaurava faction responds not with restitution but with consolidation—seeking institutional strength (Droṇa) to secure power. The verse highlights how moral insight can be eclipsed by political expediency.

After Vidura reports the citizens’ sorrow at the Pāṇḍavas’ departure to the forest, Dhṛtarāṣṭra is overcome by grief and loses composure again. Immediately afterward, Duryodhana, Karṇa, and Śakuni treat Droṇa as their dependable support and formally entrust the kingdom to him, tightening their control of the state.