सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः
युधिष्ठिरने कहा--यह जो परमानन्ददायक राजरथ है, जो हमलोगोंको यहाँतक ले आया है, रथोंमें श्रेष्ठ जैत्र नामक पुण्यमय श्रेष्ठ रथ है। चलते समय इससे मेघ और समुद्रकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती रहती है। यह अकेला ही एक हजार रथोंके समान है। इसके ऊपर बाघका चमड़ा लगा हुआ है। यह अत्यन्त सुदृढ़ है। इसके पहिये तथा अन्य आवश्यक सामग्री बहुत सुन्दर है। यह परम शोभायमान रथ क्षुद्र घण्टिकाओंसे सजाया गया है। कुरर पक्षीकी-सी कान्तिवाले आठ अच्छे घोड़े, जो समूचे राष्ट्रमें सम्मानित हैं, इस रथको वहन करते हैं। भूमिका स्पर्श करनेवाला कोई भी प्राणी इन घोड़ोंके सामने पड़ जानेपर बच नहीं सकता। राजन! इन घोड़ोंसहित यह रथ मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ ।। वैशम्पायन उवाच एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पुनः पासे फेंके और जीतका निश्चय करके युधिष्ठिस्से कहा--'लो, यह भी जीत लिया”
vaiśampāyana uvāca—evaṃ śrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitam ity eva śakunir yudhiṣṭhiram abhāṣata ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—โอ้ชนเมชัย! ครั้นได้ฟังดังนั้น ศกุนีผู้ยึดเอาเล่ห์กลและแน่วแน่ในความตั้งใจ ก็ทอยสกาอีกครั้ง แล้วกล่าวแก่ยูธิษฐิระด้วยความมั่นใจในชัยชนะว่า—“ชนะแล้ว; ข้อนี้ก็ด้วย”
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights the ethical asymmetry between dharmic restraint and adharma: a person committed to propriety (Yudhiṣṭhira) can be trapped when an opponent openly relies on fraud (nikṛti). It warns that righteousness without prudence can be exploited, especially in addictive or honor-bound contests like gambling.
After hearing the stake being offered, Śakuni—intent on cheating—throws the dice again and immediately declares victory, telling Yudhiṣṭhira that this item too has been won. It is part of the escalating rigged dice match in the Sabha (royal hall).