नारदेन दिव्यसभाः कथितुं प्रतिज्ञा
Nārada’s Prelude to Describing the Divine Assemblies
शी मी, (9) भ्ीक्श्ना ता 3. परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले वेदके वचनोंकी एकवाक्यता। ४. एकमें मिले हुए वचनोंको प्रयोगके अनुसार अलग-अलग करना। ५. यज्ञके अनेक कर्मोंके एक साथ उपस्थित होनेपर अधिकारके अनुसार यजमानके साथ कर्मका जो सम्बन्ध होता है, उसका नाम समवाय है। > दूसरेको किसी वस्तुका बोध करानेके लिये प्रवृत्त हुआ पुरुष जिस अनुमानवाक्यका प्रयोग करता है, उसमें पाँच अवयव होते हैं--प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन। जैसे किसीने कहा--'इस पर्वतपर आग है” यह वाक्य प्रतिज्ञा है। “क्योंकि वहाँ धूम है” यह हेतु है। 'जैसे रसोईघरमें धूआँ दीखनेपर वहाँ आग देखी जाती है” यह दृष्टान्त ही उदाहरण है। “चूँकि इस पर्वतपर धूआँ दिखायी देता है” हेतुकी इस उपलब्धिका नाम उपनय है। “इसलिये वहाँ आग है” यह निश्चय ही निगमन है। इस वाक्यमें अनुकूल तर्कका होना गुण है और प्रतिकूल तर्कका होना दोष है, जैसे “यदि वहाँ आग न होती, तो धूआँ भी नहीं उठता” यह अनुकूल तर्क है। जैसे कोई तालाबसे भाप उठती देखकर यह कहे कि इस तालाबमें आग है, तो उसका वह अनुमान आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभाससे युक्त होगा। $. दक्षस्मृतिमें त्रिवर्ससेवनका काल-विभाग इस प्रकार बताया गया है-- पूर्वह्ने त्वाचरेद् धर्म मध्याह्लै&र्थमुपार्जयेत् | सायाह्लै चाचरेत् काममित्येषा वैदिकी श्रुति: ।। पूर्वाह्नकालमें धर्मका आचरण करे, मध्याह्नके समय धनोपार्जनका काम देखे और सायाह्न (रात्रि)-के समय कामका सेवन करे। यह वैदिक श्रुतिका आदेश है। (नीलकण्ठीसे उद्धृत) २. राजाओंमें छः गुण होने चाहिये--व्याख्यानशक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, भूतकालकी स्मृति, भविष्यपर दृष्टि तथा नीतिनिपुणता। 3. सात उपाय ये हैं--मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, साम, दान, दण्ड और भेद। ४. परीक्षाके योग्य चौदह स्थान या व्यक्ति नीतिशास्त्रमें इस प्रकार बताये गये हैं-- देशो दुर्ग रथो हस्तिवाजियोधाधिकारिण: । अन्तः:पुरान्नगणनाशास्त्रलेख्यधनासव: ।। देश, दुर्ग, रथ, हाथी, घोड़े, शूर सैनिक, अधिकारी, अन्तःपुर, अन्न, गणना, शास्त्र, लेखय, धन और असु (बल), इनके जो चौदह अधिकारी हैं, राजाओंको उनकी परीक्षा करते रहना चाहिये। ५. राजाके कोष और धनकी वृद्धिके लिये आठ कर्म ये हैं-- कृषिर्वणिकृपथो दुर्ग सेतु: कुडजरबन्धनम् | खन््याकरकरादानं शून्यानां च निवेशनम् ।। अष्ट संधानकर्माणि प्रयुक्तानि मनीषिभि: ।। खेतीका विस्तार, व्यापारकी रक्षा, दुर्गकी रचना एवं रक्षा, पुलोंका निर्माण और उनकी रक्षा, हाथी बाँधना, सोने-हीरे आदिकी खानोंपर अधिकार करना, करकी वसूली और उजाड़ प्रान्तोंमें लोगोंको बसाना --मनीषी पुरुषोंद्वारा ये आठ संधानकर्म बताये गये हैं। <£. स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना एवं पुरवासी--ये राज्यके सात अंग ही सात प्रकृतियाँ हैं। अथवा-दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्योतिषी--ये भी सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं। > स्मृतिमें कहा है कि--'ब्राहों मुहूर्त चोत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम् । अर्थात् ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने हितका चिन्तन करे। (नीलकण्ठी टीकासे उद्धृत) $. शत्रुपक्षके मन््त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तः:पुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनको व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक--ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये। २. उपर्युक्त टिप्पणीमें अठारह तीर्थोमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं। > विजयके इच्छुक राजाके आगे खड़े होनेवाले उसके शत्रुके शत्रु २, उन शत्रुओंके मित्र २, उन मित्रोंके मित्र २-ये छः व्यक्ति युद्धमें आगे खड़े होते हैं। विजिगीषुके पीछे पार्ण्णिग्राह (पृष्ठरक्षक) और आक्रन्द (उत्साह दिलानेवाला)--ये दो व्यक्ति खड़े होते हैं। इन दोनोंकी सहायता करनेवाले एक-एक व्यक्ति इनके पीछे खड़े होते हैं, जिनकी आसार संज्ञा है। ये क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार कहे जाते हैं। इस प्रकार आगेके छः: और पीछेके चार मिलकर दस होते हैं। विजिगीषुके पार्श्रभागमें मध्यम और उसके भी पार्श्रभागमें उदासीन होता है। इन दोनोंको जोड़ लेनेसे इन सबकी संख्या बारह होती है। इन्हींको द्वादश राजमण्डल अथवा :पा्णिमूल' कहते हैं। अपने और शत्रुपक्षके इन व्यक्तियोंको जानना चाहिये। ३. नीतिशास्त्रके अनुसार विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जो लोभी हो, किंतु जिसे वेतन न मिला हो, जो मानी हो किंतु किसी तरह अपमानित हो गया हो, जो क्रोधी हो और उसे क्रोध दिलाया गया हो, जो स्वभावसे ही डरनेवाला हो और उसे पुन: डरा दिया गया हो--इन चार प्रकारके लोगोंको फोड़ ले और अपने पक्षमें ऐसे लोग हों, तो उन्हें उचित सम्मान देकर मिला ले। २. व्यसन दो प्रकारके हैं--दैव और मानुष। दैव व्यसन पाँच प्रकारके हैं--अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और महामारी। मानुष व्यसन भी पाँच प्रकारका है-मूर्ख पुरुषोंसे, चोरोंसे, शत्रुओंसे, राजाके प्रिय व्यक्तिसे तथा राजाके लोभसे प्रजाको प्राप्त भय। (नीलकंठी टीकाके अनुसार) 3. आठ अंग और चार बल भारतकौमुदीटीकाके अनुसार लिये गये हैं। १. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे। २. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्ना, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श--ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं। ३. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं--यन्त्र कहते हैं। उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं। २. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक््योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है। षष्ठो5 ध्याय: युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा वैशम्पायन उवाच सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेवचनात् परम् । प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवर्षि नारदका यह उपदेश पूर्ण होनेपर धर्मराज युधिष्ठिने भलीभाँति उनकी पूजा की; तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर उनके प्रश्नका उत्तर दिया
vaiśampāyana uvāca | sampūjyāthābhyanujñāto maharṣer vacanāt param | pratyuvācānupūrvyena dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—โอ้ชนเมชยะ! ครั้นคำสั่งสอนของมหาฤษี (เทวฤษีนารท) สิ้นสุดลงแล้ว ธรรมราชยุธิษฐิระได้บูชาท่านโดยสมควร ครั้นได้รับอนุญาตแล้ว จึงตอบเรื่องที่ถูกถามตามลำดับ ด้วยความใคร่ครวญและความเคารพ
वैशम्पायन उवाच
The verse models dharmic conduct in learning and governance: one should honor the teacher/sage, seek permission, and respond in an orderly, disciplined manner—showing humility, gratitude, and clarity.
After a great sage’s counsel ends (contextually Nārada’s), Yudhiṣṭhira respectfully worships him, receives leave to speak, and then begins answering—signaling a transition from receiving instruction to giving a considered response.