Chapter 15: Counsel on Initiative vs. Renunciation in the Rajasuya Project (सभापर्व, अध्याय १५)
गृहे गृहे हि राजान: स्वस्य स्वस्य प्रियंकरा: । न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट्छब्दो हि कृच्छूभाक्,आजकल तो घर-घरमें राजा हैं और सभी अपना-अपना प्रिय कार्य करते हैं, परंतु वे सम्राट्पदको नहीं प्राप्त कर सके; क्योंकि सम्राट्की पदवी बड़ी कठिनाईसे मिलती है
บัดนี้ดูประหนึ่งว่าทุกบ้านมีราชา ต่างก็ทำสิ่งที่ตนพอใจ แต่หาได้บรรลุความเป็นจักรพรรดิไม่ เพราะนามว่า ‘สมราฏ’ นั้นได้มายากยิ่งและหาได้โดยยาก
युधिछ्िर उवाच