Adhyāya 3: Indra’s Invitation and Yudhiṣṭhira’s Refusal to Abandon the Dog
Svargārohaṇa Test
इन्द्रने कहा--धर्मराज! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचारकर काम करो। छोड़ दो इस कुत्तेको। ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है ।। युधिछिर उवाच भक्त त्यागं प्राहुरत्यन्तपापं तुल्यं लोके ब्रह्मुवध्याकृतेन । तस्मान्नाहं जातु कथंचनाद्य त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र,युधिष्ठिर बोले--महेन्द्र! भक्तका त्याग करनेसे जो पाप होता है, उसका अन्त कभी नहीं होता--ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसारमें भक्तका त्याग ब्रह्महत्याके समान माना गया है; अतः मैं अपने सुखके लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्तेका त्याग नहीं करूँगा
yudhiṣṭhira uvāca | bhakta-tyāgaṃ prāhur atyanta-pāpaṃ tulyaṃ loke brahma-vadhyā-kṛtena | tasmān nāhaṃ jātu kathaṃcanādya tyakṣyāmy enaṃ sva-sukhārthī mahendra ||
ยุธิษฐิระตรัสว่า “โอ้มหาอินทรา บัณฑิตกล่าวว่า การทอดทิ้งผู้ภักดีนั้นเป็นบาปใหญ่ยิ่งและลบล้างมิได้ ในโลกนี้ถือเสมอด้วยการฆ่าพราหมณ์ เพราะฉะนั้นเพื่อความสุขของตน ข้าพเจ้าจะไม่ทอดทิ้งสุนัขนี้ในวันนี้ไม่ว่ากรณีใด”
युधिछिर उवाच