मद्राधिपश्चापि विमूढचेता- स्तूर्ण रथेनापकृतध्वजेन । दुर्योधनस्यथान्तिकमेत्य राजन् सबाष्पदु:खाद् वचनं बभाषे,राजन्! जिसकी ध्वजा काट दी गयी थी, उस रथके द्वारा मद्रराज शल्य भी विमूढ्चित्त होकर तुरंत दुर्योधनके पास गये और दुःखसे आँसू बहाते हुए इस प्रकार बोले--
ข้าแต่มหาราช! ศัลยะ กษัตริย์แห่งมทรา ผู้จิตหลงมัว ก็ขึ้นรถศึกที่ธงถูกตัดขาด รีบรุดมาถึงใกล้ทุรโยธน์ แล้วกล่าวถ้อยคำด้วยความโศกอันปนด้วยน้ำตาดังนี้—
संजय उवाच