अध्याय ९ — कर्णस्य प्रहारः, योधयुग्मनियोजनम्, शैनेय-कैकेययोर्युद्धविन्यासः
नागमद् द्वैरथं वीर: स कथं निहतो रणे । जिसे देवराज इन्द्रने दो कुण्डलोंके बदलेमें विद्युतके समान प्रकाशित होनेवाली तथा शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ सुवर्णभूषित दिव्य शक्ति प्रदान की थी, जिसके तूणीरमें सर्पके समान मुखवाला दिव्य, सुवर्णभूषित, कंकपत्रयुक्त एवं युद्धमें शत्रुसंहारक तीखा बाण सदा शयन करता था, जो भीष्म-द्रोण आदि महारथी वीरोंकी भी अवहेलना करता था, जिसने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे अत्यन्त घोर ब्रह्मास्त्रकी शिक्षा पायी थी और जिस महाबाहु वीरने सुभद्राकुमारके बाणोंसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य आदिको युद्धसे विमुख हुआ देख अपने तीखे बाणोंसे उसका धनुष काट डाला था, जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलशाली, वज्रके समान तीव्र वेगवाले, अपराजित वीर भीमसेनको सहसा रथहीन करके उनकी हँसी उड़ायी थी, जिसने सहदेवको जीतकर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन्हें रथहीन करके भी धर्मके विचारसे दयावश उनके प्राण नहीं लिये; जिसने सहस्रों मायाओंकी सृष्टि करनेवाले विजयाभिलाषी राक्षसराज घटोत्कचको इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे मार डाला तथा इतने दिनोंतक अर्जुन जिससे भयभीत होकर उसके साथ द्वैरथ-युद्धमें सम्मिलित नहीं हो सके, वही वीर कर्ण रणभूमिमें मारा कैसे गया? ।। संशप्तकानां योधा ये आह्वयन्त सदान्यत:,स कथं निहतो वीर: पार्थेन परवीरहा । 'संशप्तकोंमेंसे जो योद्धा सदा मुझे दूसरी ओर युद्धके लिये बुलाया करते हैं, इन्हें पहले मारकर पीछे वैकर्तन कर्णका रणभूमिमें वध करूँगा।” ऐसा बहाना बनाकर अर्जुन जिस सूतपुत्रको युद्धस्थलमें छोड़ दिया करते थे, उसी शत्रुवीरोंके संहारक वीरवर कर्णको अर्जुनने किस प्रकार मारा?
vaiśampāyana uvāca |
nāgamad dvairathaṃ vīraḥ sa kathaṃ nihato raṇe |
saṃśaptakānāṃ yodhā ye āhvayanta sadānyataḥ |
sa kathaṃ nihato vīraḥ pārthena paravīrahā ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—วีรบุรุษผู้เลื่องชื่อในยุทธรถประจัญบานนั้น เหตุใดจึงถูกสังหารในสนามรบ? และเหล่านักรบสํศัปตกะผู้คอยท้าทาย (อรชุน) ให้ไปสู้ ณ ที่อื่นอยู่เสมอ—วีรบุรุษผู้พิฆาตยอดนักรบฝ่ายศัตรูนั้น ถูกปารถะสังหารได้อย่างไร? (ความหมายคือ อรชุนมักผัดผ่อนการประจัญกับกรรณะ โดยอ้างว่า “ข้าจะปราบสํศัปตกะก่อน แล้วจึงฆ่าวৈกรตนะกรรณะ” แล้วท้ายที่สุดเขาทำให้กรรณะล้มลงได้อย่างไร?)
वैशम्पायन उवाच
The verse frames a moral-narrative puzzle: even the most formidable warrior can fall due to the complex interplay of vows, strategy, circumstance, and destiny. It invites reflection on how outcomes in war are not determined by prowess alone, but also by timing, obligations (like confronting the Saṃśaptakas), and the larger moral order (dharma) governing the epic.
Vaiśampāyana highlights the apparent contradiction that Arjuna long avoided a direct engagement with Karṇa, often diverted by the Saṃśaptakas who challenged him elsewhere. The verse asks how, despite these repeated deferrals and Karṇa’s reputation as a supreme chariot-duelist and slayer of heroes, Arjuna ultimately managed to kill him in the battle.