संजय कहते हैं--महाराज! उस महासमरमें शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने क्रोधमें भरे हुए सूतपुत्रको देखकर कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका विनाश करके वहाँ रक्तकी नदी बहा दी। जिसमें जलके स्थानमें इस पृथ्वीपर रक्त ही बह रहा था; मांस-मज्जा और हड्डियाँ कीचड़का काम दे रही थीं। मनुष्योंके कटे हुए मस्तक पत्थरोंके टुकड़ोंके समान जान पड़ते थे, हाथी और घोड़ोंकी लाशें कगार बनी हुई थीं, शूरवीरोंकी हड्डियोंके ढेर वहाँ सब ओर बिखरे हुए थे, कौए और गीध वहाँ अपनी बोली बोल रहे थे, छत्र ही हंस और छोटी नौकाका काम देते थे, वीरोंके शरीररूपी वृक्षको वह नदी बहाये लिये जाती थी, उसमें हार ही कमलवन और सफेद पगड़ी ही फेन थी, धनुष और बाण वहाँ मछलीके समान जान पड़ते थे, मनुष्योंकी छोटी-छोटी खोपड़ियाँ वहाँ बिखरी पड़ी थीं, ढाल और कवच ही उसमें भँवरके समान प्रतीत होते थे, रथरूपी छोटी नौकासे व्याप्त वह नदी विजयाभिलाषी वीरोंके लिये सुगमतापूर्वक पार होनेयोग्य और कायरोंके लिये अत्यन्त दुस्तर थी। उस नदीको बहाकर पुरुषप्रवर अर्जुनने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा-- ।। अजुन उवाच एष केतू रणे कृष्ण सूतपुत्रस्य दृश्यते । भीमसेनादयश्नैते योधयन्ति महारथम्,अर्जुन बोले--श्रीकृष्ण! रणभूमिमें यह सूतपुत्र कर्णकी ध्वजा दिखायी देती है। ये भीमसेन आदि वीर महारथी कर्णसे युद्ध करते हैं
arjuna uvāca | eṣa ketū raṇe kṛṣṇa sūtaputrasya dṛśyate | bhīmasenādayaś caite yodhayanti mahāratham ||
อรชุนกล่าวว่า “โอ้ กฤษณะ! ในสมรภูมินี้ ธงรบของกรรณะ บุตรแห่งสารถี ปรากฏชัดเจน และที่นี่ ภีมเสนกับวีรชนอื่น ๆ กำลังเข้าประจัญบานกับมหารถผู้นั้น”
अजुन उवाच
Even amid the chaos of war, Arjuna’s words show disciplined attention to signs (the banner) and to the roles of warriors. The verse highlights kṣatriya-dharma: recognizing the principal adversary and responding with clarity rather than confusion, while also hinting at the ethical weight of confronting a formidable opponent like Karṇa.
Arjuna points out to Kṛṣṇa that Karṇa’s battle-standard is visible, indicating Karṇa’s presence and position. He notes that Bhīma and other Pāṇḍava fighters are already engaged with Karṇa, setting the scene for the next tactical and narrative developments around the Karṇa-centered combat.