Chapter 43: Tumult of Battle-Sounds and the Proliferation of Dvandva
Paired Engagements
३. श्रुति-स्मृति-पुराणादिमें विभिन्न विषयोंको समझानेके लिये जो नाना प्रकारके बहुत-से उपदेश हैं, उन सभीका वाचक यहाँ 'ज्ञानानाम्” पद है। उनमेंसे प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका विवेचन करके पुरुषके वास्तविक स्वरूपको प्रत्यक्ष करा देनेवाला जो तत्त्वज्ञान है, यहाँ भगवान् उसी ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं। वह ज्ञान परमात्माके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाला और जीवात्माको प्रकृतिके बन्धनसे छुड़ाकर सदाके लिये मुक्त कर देनेवाला है, इसलिये उस ज्ञानको अन्यान्य ज्ञानोंकी अपेक्षा उतम और पर (अत्यन्त उत्कृष्ट) बतलाया गया है। २. यहाँ “मुनिजन' शब्दसे ज्ञानयोगके साधनद्वारा परम गतिको प्राप्त ज्ञानियोंको समझना चाहिये; तथा जिसको “परब्रह्मकी प्राप्ति” कहते हैं, जिसका वर्णन “परम शान्ति, “आत्यन्तिक सुख” और “अपुनरावृत्ति! आदि अनेक नामोंसे किया गया है, जहाँ जाकर फिर कोई वापस नहीं लौटता--यहाँ मुनिजनोंद्वारा प्राप्त की जानेवाली 'परम सिद्धि” भी वही है। ३. पिछले श्लोकमें “परां सिद्धिं गता:” से जो बात कही गयी है, इस श्लोकमें “मम साधर्म्यमागता:” से भी वही कही गयी है। अभिप्राय यह है कि भगवान्के निर्गुण रूपको अभेदभावसे प्राप्त हो जाना ही भगवानके साधर्म्यको प्राप्त होना है। ४. इस प्रकरणमें वर्णित ज्ञानके अनुसार प्रकृति और पुरुषके स्वरूपको समझकर गुणोंके सहित प्रकृतिसे सर्वचा अतीत हो जाना और निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें अभिन्नभावसे स्थित रहना ही इस ज्ञानका आश्रय लेना है। ५. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि इन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञानका आश्रय लेकर तदनुसार साधन करके जो पुरुष परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको अभेदभावसे प्राप्त हो चुके हैं, वे मुक्त पुरुष न तो महासर्गके आदियमें पुनः उत्पन्न होते हैं और न प्रलयकालमें पीड़ित ही होते हैं। वस्तुतः सृष्टिके सर्ग और प्रलयसे उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं रह जाता। ६. समस्त जगत्की कारणरूपा जो मूल प्रकृति है, जिसे “अव्यक्त*” और “प्रधान” भी कहते हैं; उस प्रकृतिका वाचक “महत्” विशेषणके सहित “ब्रह्म” शब्द है। यहाँ उसे योनि” नाम देकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि समस्त प्राणियोंके विभिन्न शरीरोंका यही उपादान-कारण है और यही गर्भाधानका आधार है। ७. महाप्रलयके समय अपने-अपने संस्कारोंके सहित परमेश्वरमें स्थित जीवसमुदायका जो महासर्गके आदिदमें प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध कर देना है, वही उस चेतनसमुदायरूप गर्भको प्रकृतिरूप योनिमें स्थापन करना है। ८. उपर्युक्त जड-चेतनके संयोगसे जो भिन्न-भिन्न आकृतियोंमें सब प्राणियोंका सूक्ष्मरूपसे प्रकट होना है, वही उनकी उत्पत्ति है। ३. यहाँ “मूर्ति” शब्द देव, मनुष्य, राक्षस, पशु और पक्षी आदि नाना प्रकारके भिन्न-भिन्न वर्ण और आकृतिवाले शरीरोंसे युक्त समस्त प्राणियोंका वाचक है। उन प्राणियोंका स्थूलरूपसे जन्म ग्रहण करना ही उनका उत्पन्न होना है। २. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि उन सब मूर्तियोंके जो सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके अंशसे बने हुए हैं और उन सबमें जो चेतन आत्मा है, वह मेरा अंश है। उन दोनोंके सम्बन्धसे समस्त मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी प्रकट होते हैं, अतएव प्रकृति उनकी माता है और मैं पिता हूँ। 3. अभिप्राय यह है कि गुण तीन हैं; सत्त्व, रज और तम उनके नाम हैं और तीनों परस्पर भिन्न हैं। ये तीनों गुण प्रकृतिके कार्य हैं एवं समस्त जड पदार्थ इन्हीं तीनोंका विस्तार है। ४. जिसका शरीरमें अभिमान है, उसीपर इन गुणोंका प्रभाव पड़ता है और वास्तवमें स्वरूपसे वह सब प्रकारके विकारोंसे रहित और अविनाशी है, अतएव उसका बन्धन हो ही नहीं सकता। अनादिसिद्ध अज्ञानके कारण उसने बन्धन मान रखा है। इन तीनों गुणोंका जो अपने अनुरूप भोगोंमें और शरीरोंमें इसका ममत्व, आसक्ति और अभिमान उत्पन्न कर देना है--यही उन तीनों गुणोंका उसको शरीरमें बाँध देना है। ५. सत्त्वगुणका स्वरूप सर्वथा निर्मल है, उसमें किसी भी प्रकारका कोई दोष नहीं है; इसी कारण वह प्रकाशक और अनामय है। उससे अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें प्रकाशकी वृद्धि होती है; एवं दुःख, विक्षेप, दुर्गुण और दुराचारोंका नाश होकर शान्तिकी प्राप्ति होती है। ६. 'सुख” शब्द यहाँ गीताके अठारहवें अध्यायके छत्तीसवें और सैंतीसवें श्लोकोंमें जिसकेन लक्षण बतलाये गये हैं, उस “सात्विक सुख” का वाचक है। उस सुखकी प्राप्तिके समय जो “मैं सुखी हूँ” इस प्रकार अभिमान हो जाता है तथा 'ज्ञान' बोधशक्तिका नाम है; उसके प्रकट होनेपर जो उसमें “मैं ज्ञानी हूँ", ऐसा अभिमान हो जाता है; वह उसे गुणातीत अवस्थासे वंचित रख देता है, अतः यही सत्त्वनुणका जीवात्माको सुख और ज्ञानके संगसे बाँधना है। ७. कामना और आसक्तिसे रजोगुण बढ़ता है तथा रजोगुणसे कामना और आसक्ति बढ़ती है। इनका परस्पर बीज और वृक्षकी भाँति अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। इनमें रजोगुण बीजस्थानीय और कामना, आसक्ति आदि वृक्षस्थानीय हैं। बीज वृक्षसे ही उत्पन्न होता है, तथापि वृक्षका कारण भी बीज ही है। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये कहीं रजोगुणसे कामनादिकी उत्पत्ति और कहीं कामनादिसे रजोगुणकी उत्पत्ति बतलायी गयी है। ८. “इन सब कर्मोंको मैं करता हूँ” कर्मोंमें कर्तापनके इस अभिमानपूर्वक “मुझे इसका अमुक फल मिलेगा” ऐसा मानकर कर्मोके और उनके फलोंके साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेनेका नाम “कर्मसंग' है; इसके द्वारा रजोगुणका जो इस जीवात्माको जन्म-मृत्युरूप संसारमें फँसाये रखना है, वही उसका कर्मसंगके द्वारा जीवात्माको बाँधना है। ३. अन्त:करण और इन्द्रियोंमें ज्ञाशशक्तिका अभाव करके उनमें मोह उत्पन्न कर देना ही तमोगुणका सब देहाभिमानियोंको मोहित करना है। २. इस अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें तो अज्ञानकी उत्पत्ति तमोगुणसे बतलायी है और यहाँ तमोगुणको अज्ञानसे उत्पन्न बतलाया गया--इसका अभिप्राय यह है कि तमोगुणसे अज्ञान बढ़ता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है। इन दोनोंमें भी बीज और वृक्षकी भाँति अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है, अज्ञान बीजस्थानीय है और तमोगुण वृक्षस्थानीय है। ३. अन्तःकरण और इन्द्रियोंकी व्यर्थ चेष्टाका एवं शास्त्रविहित कर्तव्यपालनमें अवहेलनाका नाम *प्रमाद' है। कर्तव्यकर्मोमें अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमताका नाम “आलस्य' है। तन्द्रा, स्वप्न और सुषुप्ति--इन सबका नाम "निद्रा" है। इन सबके द्वारा जो तमोगुणका इस जीवात्माको मुक्तिके साधनसे वंचित रखकर जन्म-मृत्युरूप संसारमें फँसाये रखना है--यही उसका प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा जीवात्माको बाँधना है। ४. 'सुख' शब्द यहाँ सातक्त्विक सुखका वाचक है (गीता १८।३६, ३७) और सत्त्गगुणका जो इस मनुष्यको सांसारिक भोगों और चेष्टाओंसे तथा प्रमाद, आलस्य और निद्रासे हटाकर आत्मचिन्तन आदिके द्वारा साच्चिक सुखसे संयुक्त कर देना है--यही उसको सुखमें लगाना है। ५. “कर्म” शब्द यहाँ (इस लोक और परलोकके भोगरूप फल देनेवाले) शास्त्रविहित सकामकर्मोंका वाचक है। नाना प्रकारके भोगोंकी इच्छा उत्पन्न करके उनकी प्राप्तिके लिये उन कर्माँमें मनुष्यको प्रवृत्त कर देना ही रजोगुणका मनुष्यको उन कर्माँमें लगाना है। ६. जब तमोगुण बढ़ता है, तब वह कभी तो मनुष्यकी कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय करनेवाली विवेकशक्तिको नष्ट कर देता है और कभी अन्तःकरण और इन्द्रियोंकी चेतनाको नष्ट करके निद्राकी वृत्ति उत्पन्न कर देता है--यही उसका मनुष्यके ज्ञानको आच्छादित करना है और कर्तव्यपालनमें अवहेलना कराके व्यर्थ चेष्टाओंमें नियुक्त कर देना 'प्रमाद” में लगाना है। ७. रजोगुणके कार्य लोभ, प्रवृत्ति और भोगवासनादि तथा तमोगुणके कार्य निद्रा, आलस्य और प्रमाद आदिको दबाकर जो सत्त्वगुणका ज्ञान, प्रकाश और सुख आदिको उत्पन्न कर देना है, यही रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुणका बढ़ जाना है। ८. जिस समय सत्त्वगुण और तमोगुणकी प्रवृत्तिको रोककर रजोगुण अपना कार्य आरम्भ करता है, उस समय शरीर, इन्द्रिय और अन्त:करणमें चंचलता, अशान्ति, लोभ, भोगवासना और नाना प्रकारके कर्मामें प्रवृत्त होनेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न हो जाती है--यही सत्त्वगुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुणका बढ़ जाना है। ९. जिस समय सत्त्वगगुण और रजोगुणकी प्रवृत्तिको रोककर तमोगुण अपना कार्य आरम्भ करता है, उस समय शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें मोह आदि बढ़ जाते हैं और प्रमादमें प्रवृत्ति हो जाती है, वृत्तियाँ विवेकशून्य हो जाती हैं--यही सत्त्वमुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुणका बढ़ना है। $. गुणोंकी वृद्धिमें निम्नलिखित दस हेतु श्रीमद्भागवतमें बतलाये हैं-- आगमो<प: प्रजा देश: काल: कर्म च जन्म च । ध्यान॑ मन्त्रो5थ संस्कारों दशैते गुणहेतव: ।। (११,गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:
arjuna uvāca
อรชุนกล่าวว่า—(ข้อความที่ให้มานี้มิใช่คาถาต้นฉบับ หากเป็นคำอธิบายยืดยาวแบบสำนักพิมพ์คีตาเพรส ว่าด้วยหลักปรกฤติและปุรุษ ธรรมชาติของคุณทั้งสาม—สัตตวะ รชัส ตมัส—และการที่ชีวะผู้ยึดมั่นในกายถูกผูกมัดด้วยความยึดติดในสุข การกระทำ และความหลงใหล อีกทั้งยืนยันว่า “ญาณแท้” ซึ่งทำให้ประจักษ์พระปรมาตมัน ย่อมปลดชีวะจากพันธนาการแห่งธรรมชาติ และผู้หลุดพ้นเช่นนั้นไม่หวั่นไหวต่อวัฏจักรการสร้างและการล่มสลายของจักรวาล)
अजुन उवाच
Liberating knowledge (tattva-jñāna) is the discriminative insight that distinguishes prakṛti (nature with the three guṇas) from puruṣa (the conscious self). The guṇas bind the embodied being through attachment—sattva through pleasure and pride in knowledge, rajas through doership and craving for results, tamas through delusion, negligence, laziness, and sleep. Realization of the Supreme (nirguṇa Brahman) frees one from these bonds and from any real connection to cosmic creation and dissolution.
Although labeled with 'Arjuna said,' the provided material functions as doctrinal exposition: it explains the Lord’s promised teaching about reality, describes how beings arise from the conjunction of prakṛti and the conscious principle, and analyzes the ethical-psychological effects of sattva, rajas, and tamas on human conduct and spiritual progress.