६) अर्थात् “वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।। इसीको परम शान्तिकी प्राप्ति, अक्षय सुखकी प्राप्ति, ब्रह्मप्राप्ति, मोक्षप्राप्ति और परमगतिकी प्राप्ति कहते हैं। ३. इस जन्म और जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार, राग-द्वेषादि दोष तथा उनकी वृत्तियोंके पुंज, जो मनुष्यके अन्तःकरणमें इकट्ठे रहते हैं, बन्धनमें हेतु होनेके कारण सभी कल्मष--पाप हैं। परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर इन सबका नाश हो जाता है। फिर उस पुरुषके अन्तःकरणमें दोषका लेशमात्र भी नहीं रहता। ४. यहाँ “कामक्रोधवियुक्तानाम' से मलदोषका, “यतचेतसाम्' से विक्षेपदोषका और “विदितात्मनाम्' से आवरणदोषका सर्वथा अभाव दिखलाकर परमात्माके पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति बतलायी गयी है। इसलिये “यति” शब्दका अर्थ यहाँ सांख्ययोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त आत्मसंयमी तत्त्वज्ञानी मानना उचित है। ५. परमात्माको प्राप्त ज्ञानी महापुरुषोंके अनुभवमें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर, यहाँ-वहाँ, सर्वत्र नित्य-निरन्तर एक विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही विद्यमान हैं--एक अद्वितीय परमात्माके सिवा अन्य किसी भी पदार्थकी सत्ता ही नहीं है, इसी अभिप्रायसे कहा गया है कि उनके लिये सभी ओरसे परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। ६. विवेक और वैराग्यके बलसे सम्पूर्ण बाह्रुविषयोंको क्षणभंगुर, अनित्य, दुःखमय और दुःखोंके कारण समझकर उनके संस्काररूप समस्त चित्रोंको अन्तःकरणसे निकाल देना--उनकी स्मृतिको सर्वथा नष्ट कर देना ही बाहरके विषयोंको बाहर निकाल देना है। ७. नेत्रोंके द्वारा चारों ओर देखते रहनेसे तो ध्यानमें स्वाभाविक ही विघष्न--विक्षेप होता है और उन्हें बंद कर लेनेसे आलस्य और निद्राके वश हो जानेका भय है। इसीलिये नेत्रोंकी दृष्टिको भूकुटीके बीचमें स्थिर करनेको कहा गया है। ८. प्राण और अपानकी स्वाभाविक गति विषम है। कभी तो वे वाम नासिकामें विचरते हैं और कभी दक्षिण नासिकामें। वाममें चलनेको इडानाडीमें चलना और दक्षिणमें चलनेको पिंगलामें चलना कहते हैं। ऐसी अवस्थामें मनुष्यका चित्त चंचल रहता है। इस प्रकार विषमभावसे विचरनेवाले प्राण और अपानकी गतिको दोनों नासिकाओंमें समानभावसे कर देना उनको सम करना है। यही उनका सुषुम्णामें चलना है। सुषुम्णा नाड़ीपर चलते समय प्राण और अपानकी गति बहुत ही सूक्ष्म और शान्त रहती है। तब मनकी चंचलता और अशान्ति अपने-आप ही नष्ट हो जाती है और वह सहज ही परमात्माके ध्यानमें लग जाता है। $. इन्द्रियाँ चाहे जब, चाहे जिस विषयमें स्वच्छन्द चली जाती हैं, मन सदा चंचल रहता है और अपनी आदतको छोड़ना ही नहीं चाहता एवं बुद्धि एक परम निश्चयपर अटल नहीं रहती--यही इनका स्वतन्त्र या उच्छृंखल हो जाना है। विवेक और वैराग्यपूर्वक अभ्यारुद्वारा इन्हें सुशृंखल, आज्ञाकारी और अन्तर्मुखी या भगवन्निष्ठ बना लेना ही इनको जीतना है। २. “मुनि” मननशीलको कहते हैं, जो पुरुष ध्यानकालकी भाँति व्यवहारकालमें भी परमात्माकी सर्वव्यापकताका दृढ निश्चय होनेके कारण सदा परमात्माका ही मनन करता रहता है, वही “मुनि” है। ३. जो महापुरुष उपर्युक्त साधनोंद्वारा इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह ध्यानकालमें या व्यवहारकालमें, शरीर रहते या शरीर छूट जानेपर, सभी अवस्थाओंमें सदा मुक्त ही है--संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा छूटकर परमात्माको प्राप्त हो चुका है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। ४. अहिंसा, सत्य आदि धर्मोंका पालन, देवता, ब्राह्मण, माता-पिता आदि गुरुजनोंका सेवन-पूजन, दीन-दुःखी, गरीब और पीड़ित जीवोंकी स्नेह और आदरयुक्त सेवा और उनके दुःखनाशके लिये किये जानेवाले उपर्युक्त साधन एवं यज्ञ, दान आदि जितने भी शुभ कर्म हैं, सभीका समावेश “यज्ञ” और “तप' शब्दोंमें समझना चाहिये। भगवान् सबके आत्मा हैं (गीता १०२०) अतएव देवता, ब्राह्मण, दीन-दु:खी आदिके रूपमें स्थित होकर भगवान् ही समस्त सेवा-पूजादि ग्रहण कर रहे हैं। इसलिये वे ही समस्त यज्ञ और तपोंके भोक्ता हैं (गीता ९।२४)। इस प्रकार समझना ही भगवान्को “यज्ञ और तपोंका भोगनेवाला” समझना है। ५, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज आदि जितने भी लोकपाल हैं तथा विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें अपने-अपने ब्रह्माण्डका नियन्त्रण करनेवाले जितने भी ईश्वर हैं, भगवान् उन सभीके स्वामी और महान् ईश्वर हैं। इसीसे श्रुतिमें कहा है --तमीश्वराणां परम महेश्वरम” “उन ईश्वरोंके भी परम महेश्वरको” (श्वेताश्बतर उप० ६।७)। अपनी अनिर्वचनीय मायाशक्तिद्वारा भगवान् अपनी लीलासे ही सम्पूर्ण अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हुए सबको यथायोग्य नियन्त्रणमें रखते हैं और ऐसा करते हुए भी वे सबसे ऊपर ही रहते हैं। इस प्रकार भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वनियन्ता, सर्वाध्यक्ष और सर्वेश्वरेश्वर समझना ही उन्हें 'सर्वलोकमहेश्वर” समझना है। ६. भगवान् स्वाभाविक ही सबपर अनुग्रह करके सबके हितकी व्यवस्था करते हैं और बार-बार अवतीर्ण होकर नाना प्रकारके ऐसे विचित्र चरित्र करते हैं, जिन्हें गा-गाकर ही लोग तर जाते हैं। उनकी प्रत्येक क्रियामें जगत्का हित भरा रहता है। भगवान् जिनको मारते या दण्ड देते हैं, उनपर भी दया ही करते हैं, उनका कोई भी विधान दया और प्रेमसे रहित नहीं होता। इसीलिये भगवान् सब भूतोंके सुहृद् हैं। ७. जो पुरुष इस बातको जान लेता है और विश्वास कर लेता है कि “भगवान् मेरे अहैतुक प्रेमी हैं, वे जो कुछ भी करते हैं, मेरे मंगलके लिये ही करते हैं", वह प्रत्येक अवस्थामें जो कुछ भी होता है, उसको दयामय परमेश्वरका प्रेम और दयासे ओततप्रोत मंगलविधान समझकर सदा ही प्रसन्न रहता है। इसलिये उसे अटल शान्ति मिल जाती है। उसकी शान्तिमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित होनेका कोई कारण ही नहीं रह जाता। त्रिशोड्थ्याय: (श्रीमद्धगवदगीतायां षष्ठो5ध्याय:) निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन सम्बन्ध-- पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अजुनने 'कर्मसंन्यास” (सांख्ययोग) और “कर्मयोग“--इन दोनोंगेंसे कौन-सा एक साधन मेरे लिये युनिश्चित कल्याणप्रद है? यह बतलानेके लिये भगवानूसे प्रार्था की थी। इसपर भगवान्ने दोनों साधनोंको कल्याणप्रद बतलाया और फलमें दोनोंकी समानता होनेपर भी साधनमें सुगगता होनेके कारण “कर्मसंन्यास” की अपेक्षा 'कर्मयोग-की श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया। तदनन्तर दोनों साधनोंके स्वरूप, उनकी विधि और उनके फलका भलीभाँति निरूपण करके दोनोंके लिये ही अत्यन्त उपयोगी एवं परमात्माकी प्राप्तिका प्रधान उपाय समझकर संक्षेप्ें ध्यानयोगका भी वर्णन किया; परंतु दोनोंमेंसे कौन-सा साधन करना चाहिये, इस बातको न तो जअर्जुनको स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा ही की गयी और न ध्यानयोयका ही अंग- प्रत्यंगोंसाहित विस्तारसे वर्ण हुआ। इसलिये अब ध्यानयोगका अंगोंसहित विस्तृत वर्णन करनेके लिये छठे अध्यायका आरम्भ करते हुए सबसे पहले अर्जुनको भक्तियुक्त कर्मयोगर्ें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे कर्मयोगकी प्रशंया करते हैं-- श्रीभगवानुवाच अनाश्रित: कर्मफलं कार्य कर्म करोति य:ः । स संनन््यासी च योगी च न निरमन्निर्न चाक्रिय:,श्रीभगवान् बोले--जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह संन््यासी तथा योगी है? और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं हैः तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं +
arjuna uvāca
ผู้ใดกระทำกิจอันพึงกระทำโดยไม่ยึดอาศัยผลแห่งกรรม ผู้นั้นแลเป็นทั้งสันยาสีและโยคี; มิใช่ผู้เพียงละไฟพิธีเท่านั้นเป็นสันยาสี และมิใช่ผู้เพียงละการกระทำเท่านั้นเป็นโยคี
अर्जुन उवाच
The opening of this section signals Arjuna’s request for a clear criterion of the best spiritual discipline—renunciation of action or selfless action—setting up the teaching that true renunciation is inner non-attachment rather than mere external withdrawal.
On the battlefield setting of the Mahābhārata, Arjuna addresses Kṛṣṇa to resolve his confusion about the proper path to liberation and steadiness of mind, which leads into the Gītā’s exposition of yoga and meditation.