कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको प्राप्त है ।। सम्बन्ध--इस प्रकार अजुनिके चारों प्रश्नोंका उत्तर देनेके अनन्तर अब स्थितप्रज्ञ पुरुषकी स्थितिका महत्त्व बतलाते हुए इस अध्यायका उपसंद्यार करते एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्प विमुह्ति । स्थित्वास्यामन्तकाले5पि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति,हे अर्जुन! यह ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषकी स्थिति है; इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होताः और अन्तकालमें भी इस ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर ब्रह्मानन्दको प्राप्त हो जाता है
arjuna uvāca: yaḥ puruṣaḥ sarvān kāmān parityajya nirmamo nirahaṅkāraḥ niḥspṛhaḥ carati sa śāntim adhigacchati | eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati | sthitvā asyām antakāle 'pi brahmanirvāṇam ṛcchati ||
โอ้ ปารถะ นี่คือพราหมีสถานะ; เมื่อบรรลุแล้ว โยคีไม่หลงผิดอีกต่อไป และแม้ในวาระสุดท้ายของชีวิต หากตั้งมั่นอยู่ในภาวะนี้ ก็ย่อมบรรลุพรหมนิรวาณ (โมกษะ)
अजुन उवाच