कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- यहाँतक भगवान्ने सांख्ययोगयके अनुसार अनेक युक्तियोंद्वारा नित्य शुद्ध. बुद्ध, सम, निर्विकार और अकर्ता आत्माके एकत्व, नित्यत्व, अविनाशित्व आदिका प्रतिपादन करके तथा शरीरोंको विनाशशील बतलाकर आत्माके या शरीरोंके लिये अथवा शरीर और आत्माके वियोगके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया। याथ ही प्रसंगवश आत्माको जन्मने-मरनेवाला माननेपर भी शोक करनेके अनौचित्यका प्रतिपादन किया और अर्जुनको युद्ध करनेके लिये आज्ञा दी। अब सात श*लोकॉद्वारा क्षात्रधर्मके अनुसार शोक करना अनुचित सिद्ध करते हुए अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हैं-- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमरहसि । धम्यद्धि युद्धाच्छेयोडन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते,तथा अपने धर्मको देखकर भी तू भय करनेयोग्य नहीं है यानी तुझे भय नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्षत्रियके लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
svadharmam api cāvekṣya na vikampitum arhasi | dharmyād dhi yuddhāc chreyo 'nyat kṣatriyasya na vidyate ||
แม้เมื่อพิจารณาธรรมประจำตนแล้ว เจ้าก็ไม่ควรหวั่นไหว; เพราะสำหรับกษัตริย์นักรบ (กษัตริยะ) ไม่มีหน้าที่ใดประเสริฐยิ่งไปกว่าสงครามอันชอบธรรมตามธรรม.
संजय उवाच