Adhyāya 34: Kṣetrajña-Lakṣaṇa and the Araṇi Metaphor
Mind–Intellect Allegory
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते । पश्यत: शृण्वतो बुद्धिरात्मनो येषु जायते,यह कर्तव्य है, यह कर्तव्य नहीं है--यह बात मोक्षके साधनोंमें नहीं कही जाती। जिन साधनोंमें देखने और सुननेवालेकी बुद्धि आत्माके स्वरूपमें निश्चित होती है, वही यथार्थ साधन है
“สิ่งนี้ควรทำ สิ่งนี้ไม่ควรทำ”—หาใช่คำสอนในหนทางแห่งโมกษะไม่ หนทางที่แท้คือสิ่งซึ่งทำให้ปัญญาของผู้เห็นและผู้ฟังตั้งมั่นในสภาวะแห่งอาตมัน
ब्राह्मण उवाच