Pañcahotṛ-Vidhāna and the Dispute of the Five Vāyus (पञ्चहोतृविधानम् — पञ्चवायूनां श्रेष्ठत्वविवादः)
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२ ॥। - इस श्लोकका सारांश इस प्रकार समझना चाहिये--पहले आत्मा मनको उच्चारण करनेके लिये प्रेरित करता है, तब मन जठराग्निको प्रज्वलित करता है। जठराग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके प्रभावसे प्राणवायु अपानवायुसे जा मिलता है। उसके बाद वह वायु उदानवायुके प्रभावसे ऊपर चढ़कर मस्तकमें टकराता है और फिर व्यानवायुके प्रभावसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंमें होकर वेगसे वर्ण उत्पन्न कराता हुआ वैखरीरूपसे मनुष्योंके कानमें प्रविष्ट होता है। जब प्राणवायुका वेग निवृत्त हो जाता है, तब वह फिर समानभावसे चलने लगता है। त्रयोविशो<् ध्याय: प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठ बतलाना ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे पञ्चहोतृणां विधानमिह यादृशम्,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! अब पञ्चहोताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसके विषयमें एक प्राचीन दृष्टान्त बतलाया जाता है
brāhmaṇa uvāca | atrāpy udāharantīmam itihāsaṁ purātanam | subhage pañcahotṝṇāṁ vidhānam iha yādṛśam ||
พราหมณ์กล่าวว่า “นางผู้เป็นที่รัก ที่นี่ก็ยังยกแบบอย่างโบราณขึ้นกล่าวด้วย ในบริบทนี้เราจักเล่าตามที่สืบสอนกันมา ถึงกฎเกณฑ์และการจัดวางของยัญพิธี ‘ปัญจโหตฤ’ อันมีผู้ประกอบพิธีห้าประการ”
ब्राह्मण उवाच
The verse introduces a didactic move: the speaker grounds instruction about the ‘five-officiant’ sacrificial order in an authoritative ancient precedent (itihāsa), implying that right practice (vidhi) is preserved and validated through tradition.
A Brāhmaṇa, addressing a woman as ‘Subhagā’ (beloved/fortunate), announces that he will recount an old illustrative story and, through it, explain the prescribed arrangement of the pañcahotṛ-sacrifice.