धृतराष्ट्रस्य पश्चात्तापः तथा वनप्रस्थानानुज्ञा | Dhṛtarāṣṭra’s Remorse and Request for Forest-Retirement
सर्वे मन्त्रगृहे वर्ज्या ये चापि जडपड़व: । “जहाँ अधिक घास-फूस या झाड़-झंखाड़ न हो, ऐसे जंगलमें भी गुप्त मन्त्रणा की जा सकती है; परंतु रात्रिके समय इन स्थानोंमें किसी तरह गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। मनुष्योंका अनुसरण करनेवाले जो वानर और पक्षी आदि हैं, उन सबको तथा मूर्ख एवं पंगु मनुष्योंको भी मन्त्रणा-गृहमें नहीं आने देना चाहिये || २३ $ ।। मन्त्रभेदे हि ये दोषा भवन्ति पृथिवीक्षिताम्
sarve mantragṛhe varjyā ye cāpi jaḍapaṅgavaḥ | mantrabhede hi ye doṣā bhavanti pṛthivīkṣitām ||
ในสภามนตรี พึงกันผู้ปัญญาทึบและผู้พิการทั้งปวงออกไป เพราะเมื่อความลับแห่งคำปรึกษารั่วไหล โทษและภัยพิบัติที่บังเกิดแก่พระราชาผู้ครองแผ่นดินนั้นหนักหนายิ่งนัก
वैशम्पायन उवाच