कुन्त्याः वनगमननिश्चयः — Kuntī’s Resolve to Depart for the Forest
पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । रथानीकेन महता निर्जगाम कुरूद्वह:,तत्पश्चात् ब्राह्मणोंसे घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर बहुसंख्यक सूत, मागध और वन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए मस्तकपर श्वेत छत्र धारण किये विशाल रथ- सेनाके साथ वहाँसे चले
เมื่อมีฉัตรสีขาวนวลกางเหนือพระเศียร และมีกองทัพรถศึกอันใหญ่หลวงตามเสด็จ กุรุผู้ประเสริฐก็เสด็จออกจากที่นั้น
वैशम्पायन उवाच