Previous Verse

Shloka 96

Taḍāga-Phala and Vṛkṣāropaṇa

Merit of Ponds and Tree-Planting

[सिवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति] युधिछिर उवाच शूद्राणामिह शुश्रूषा नित्यमेवानुवर्णिता । कै: कारणै: कतिविधा शुश्रूषा समुदाह्वता ।। युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! इस जगत्‌में शूद्रोंके लिये सदा द्विजातियोंकी सेवाको ही परम धर्म बताया गया है। वह सेवा किन कारणोंसे कितने प्रकारकी कही गयी है? ।। के च शुश्रूषया लोका विहिता भरतर्षभ । शूद्राणां भरतश्रेष्ठ ब्रूहि मे धर्मलक्षणम्‌ ।। भरतभूषण! भरतरत्न! शूद्रोंको द्विजोंकी सेवासे किन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है? मुझे धर्मका लक्षण बताइये ।। भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । शूद्राणामनुकम्पार्थ यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।। भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें ब्रह्मवादी पराशरने शूद्रोंपर कृपा करनेके लिये जो कुछ कहा है, उसी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। वृद्धः पराशर: प्राह धर्म शुभ्रमनामयम्‌ । अनुग्रहार्थ वर्णानां शौचाचारसमन्वितम्‌ ।। बड़े-बूढ़े पराशर मुनिने सब वर्णोॉपर कृपा करनेके लिये शौचाचारसे सम्पन्न निर्मल एवं अनामय धर्मका प्रतिपादन किया ।। धर्मोपदेशमखिलं यथावदनुपूर्वश: । शिष्यानध्यापयामास शास्त्रमर्थवदर्थवित्‌ ।। तत्त्वज्ञ पराशर मुनिने अपने सारे धर्मोपदेशको ठीक-ठीक आनुपूर्वीसहित अपने शिष्योंको पढ़ाया। वह एक सार्थक धर्मशास्त्र था ।। पराशर उवाच क्षान्तेन्द्रियेण दान्तेन शुचिनाचापलेन वै । अदुर्बलेन धीरेण नोत्तरोत्तरवादिना ।। अलुब्धेनानृशंसेन ऋजुना ब्रह्मवादिना । चारित्रतत्परेणैव सर्वभूतहितात्मना ।। अरय: षड्‌ विजेतव्या नित्यं स्व॑ं देहमाश्रिता: । कामक्रोधौ च लोभश्व मानमोहौ मदस्तथा ।। पराशरने कहा-मनुष्यको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय, मनोनिग्रही, पवित्र, चंचलतारहित, सबल, थधैर्यशील, उत्तरोत्तर वाद-विवाद न करनेवाला, लोभहीन, दयालु, सरल, ब्रह्मवादी, सदाचारपरायण और सर्वभूतहितैषी होकर सदा अपने ही देहमें रहनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह और मद--इन छ: शत्रुओंको अवश्य जीते ।। विधिना धृतिमास्थाय शुश्रूषुरनहंकृत: । वर्णत्रयस्यानुमतो यथाशक्ति यथाबलम्‌ ।। कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा च चतुर्विधम्‌ | आस्थाय नियमं धीमान्‌ शान्तो दान्तो जितेन्द्रिय: ।। बुद्धिमान मनुष्य विधिपूर्वक धैर्यका आश्रय ले गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर, अहंकारशून्य तथा तीनों वर्णोकी सहानुभूतिका पात्र होकर अपनी शक्ति और बलके अनुसार कर्म, मन, वाणी और नेत्र--इन चारोंके द्वारा चार प्रकारके संयमका अवलम्बन ले शान्तचित्त, दमनशील एवं जितेन्द्रिय हो जाय ।। नित्यं दक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजन: । वर्णत्रयान्मधु यथा भ्रमरो धर्ममाचरन्‌ ।। दक्ष--ज्ञानीजनोंका नित्य अन्वेषण करनेवाला यज्ञशेष अमृतरूप अन्नका भोजन करे। जैसे भौंरा फूलोंसे मधुका संचय करता है, उसी प्रकार तीनों वर्णोंसे मधुकरी भिक्षाका संचय करते हुए ब्राह्मण भिक्षुको धर्मका आचरण करना चाहिये ।। स्वाध्यायधनिनो वित्रा: क्षत्रियाणां बलं धनम्‌ । वणिक्कृषिश्न वैश्यानां शूद्राणां परिचारिका ।। व्युच्छेदात्‌ तस्य धर्मस्य निरयायोपपद्यते । ब्राह्मणोंका धन है वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय, क्षत्रियोंका धन है बल, वैश्योंका धन है व्यापार और खेती, तथा शूद्रोंका धन है तीनों वर्णोकी सेवा। इस धर्मरूपी धनका उच्छेद करनेसे मनुष्य नरकमें पड़ता है ।। ततो म्लेच्छा भवन्त्येते निर्घ॒णा धर्मवर्जिता: ।। पुनश्न निययं तेषां तिर्यग्योनिश्व शाश्वती | नरकसे निकलनेपर ये धर्मरहित निर्दय मनुष्य म्लेच्छ होते हैं और म्लेच्छ होनेके बाद फिर पापकर्म करनेसे उन्हें सदाके लिये नरक और पशु-पक्षी आदि तिर्यक्‌ योनिकी प्राप्ति होती है ।। ये तु सत्पथमास्थाय वर्णाश्रमकृतं पुरा ।। सर्वान्‌ विमागनित्सृज्य स्वधर्मपथमाश्रिता: । सर्वभूतदयावन्तो दैवतद्विजपूजका: ।। शास्त्रदृष्टेन विधिना श्रद्धया जितमन्यव: । तेषां विधिं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वश: ।। उपादानविदधिं कृत्स्नं शुश्रूषाधिगमं तथा । जो लोग प्राचीन वर्णाश्रमोचित सन्मार्गका आश्रय ले सारे विपरीत मार्गोंका परित्याग करके स्वधर्मके मार्गपर चलते हैं, समस्त प्राणियोंके प्रति दया रखते हैं और क्रोधको जीतकर शास्त्रोक्त विधिसे श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये यथावत्‌ रूपसे क्रमशः सम्पूर्ण धर्मोंके ग्रहणकी विधि तथा सेवाभावकी प्राप्ति आदिका वर्णन करता हूँ ।। शौचकृत्यस्य शौचार्थान्‌ सर्वानिव विशेषत: ।। महाशौचप्रभृतयो दृष्टास्तत्त्वार्थदर्शिभि: | जो विशेषरूपसे शौचका सम्पादन करना चाहते हैं, उनके लिये सभी शौचविषयक प्रयोजनोंका वर्णन करता हूँ। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने शास्त्रमें महाशौच आदि विधानोंको प्रत्यक्ष देखा है ।। तत्रापि शूद्रो भिक्षूणां मृदं शेषं च कल्पयेत्‌ ।। वहाँ शूद्र भी भिक्षुओंके शौचाचारके लिये मिट्टी तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंका प्रबन्ध करे ।। भिक्षुभि: सुकृतप्रज्जै: केवल धर्ममाश्रितै: | सम्यग्दर्शनसम्पन्नैर्गता ध्वनि हितार्थिभि: ।। अवकाशगमिदं मेध्यं निर्मितं कामवीरुधम्‌ । जो धर्मके ज्ञाता, केवल धर्मके ही आश्रित तथा सम्यक्‌ ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन सर्वहितैषी संन्यासियोंको चाहिये कि वे सज्जनाचरित मार्गपर स्थित हो इस पवित्र कामलतास्वरूप स्थान (मलत्यागके योग्य क्षेत्र आदि) का निश्चय करे ।। निर्जन॑ संवृतं बुद्ध्वा नियतात्मा जितेन्द्रिय: ।। सजलं भाजन स्थाप्य॑ मृत्तिकां च परीक्षिताम्‌ परीक्ष्य भूमिं मूत्रार्थी तत आसीत वाग्यत: ।। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह निर्जन एवं घिरे हुए स्थानको देखकर वहाँ सजल पात्र और देख-भाल कर ली हुई मृत्तिका रखे। फिर उस भूमिका भलीभाँति निरीक्षण करके मौन होकर मूत्र-त्यागके लिये बैठे ।। उदड्मुखो दिवा कुर्याद्‌ रात्रौ चेद्‌ दक्षिणामुख: । अन्तर्हितायां भूमौ तु अन्तर्हितशिरास्तथा ।। यदि दिन हो तो उत्तरकी ओर मुँह करके और रात हो तो दक्षिणाभिमुख होकर मल या मूत्रका त्याग करे। मल त्याग करनेके पूर्व उस समय भूमिको तिनके आदिसे ढके रखना चाहिये तथा अपने मस्तकको भी वस्त्रसे आच्छादित किये रहना उचित है ।। असमाप्ते तथा शौचे न वाचं किंचिदीरयेत्‌ । कृतकृत्यस्तथा55चम्य गच्छन्नोदीरयेद्‌ वच: ।। जबतक शौच-कर्म समाप्त न हो जाय तबतक मुँहसे कुछ न बोले, अर्थात्‌ मौन रहे। शौच-कर्म पूरा करके भी आचमनके अनन्तर जाते समय मौन ही रहे ।। शौचार्थमुपतिषंस्तु मृदृुभाजनपुरस्कृत: । स्थाप्यं कमण्डलुं गृहा पाश्चोरुभ्यामथान्तरे ।। शौचं कुर्याच्छनैर्धीरो बुद्धिपूर्वमसंकरम्‌ | शौचके लिये बैठा हुआ पुरुष अपने सामने मृत्तिका और जलपात्र रखे। धीर पुरुष कमण्डलुको हाथमें लिये हुए दाहिने पार्श्व और ऊरुके मध्यदेशमें रखे और सावधानीके साथ धीरे-धीरे मूत्र-त्याग करे, जिससे अपने किसी अंगपर उसका छींटा न पड़े ।। पाणिना शुद्धमुदकं संगृहा विधिपूर्वकम्‌ ।। विप्रुषश्च यथा न स्युर्यथा चोरू न संस्पृशेत्‌ । तत्पश्चात्‌ हाथसे विधिपूर्वक शुद्ध जल लेकर मूत्रस्थान (उपस्थ) को ऐसी सावधानीके साथ धोये, जिससे उसमें मूत्रकी बूँदें नलगी रह जायँ तथा अशुद्ध हाथसे दोनों जाँघोंका भी स्पर्श न करे ।। अपाने मृत्तिकास्तिस्र: प्रदेयास्त्वनुपूर्वश: ।। यथा घातो हि न भवेत्‌ क्लेदज: परिधानके । यदि मल त्याग किया गया हो तो गुदाभागको धोते समय उसमें क्रमश: तीन बार मिट्टी लगाये। गुदाको शुद्ध करनेके लिये बारंबार इस प्रकार धोना चाहिये कि जलका आघात कपड़ेमें न लगे ।। सव्ये द्वादश देया: स्युस्तिस्नस्तिस्र: पुन: पुनः । तत्पश्चात्‌ बायें हाथमें बारह बार और दाहिनेमें कई बार तीन-तीन बार मिट्टी लगावे ।। मलोपहतचैलस्य द्विगुणं तु विधीयते ।। सहपादमथोरुभ्यां हस्तशौचमसंशयम्‌ । जिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है। उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ।। अवधीरयमाणस्य संदेह उपजायते । यथा यथा विशुद्ध्येत तत्‌ तथा तदुपक्रमेत्‌ ।। शौचका पालन न करनेसे शरीर-शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है। अत: जिस-जिस प्रकारसे शरीर-शुद्धि हो वैसे-ही-वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ।। क्षारौषराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह ।। लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते । मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये। जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्‍्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ।। देयाश्षतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाप्येकां तथा55पदि ।। कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम्‌ । आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये। देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ।। विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रित: ।। अविधप्रेक्षन्नसम्भ्रान्त: पादौ प्रक्षाल्य तत्पर: । इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच (शुद्धि) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर-उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ।। सुप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात्‌ ।। अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पशेत्‌ । पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले। इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ।। मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरप: पिबेत्‌ ।। द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद्‌ बुध: । आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये। उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात्‌ वह जल हृदयतक पहुँचे। विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे। इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ।। ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदप: । द्वितीयं च यजुर्वेद॑ तृतीयं साम एव च ।। वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ।। मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात्‌ ।। द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवता: । पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास-पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ।। यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत्‌ ।। प्रीणाति वायुं प्राणं च दिशश्वाप्यथ श्रोत्रयो: । मुखमार्जनके पश्चात्‌ द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है। नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ।। ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्थनि समालभेत्‌ ।। समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत्‌ । आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ।। प्रीणाति विष्णु: पदभ्यां तु सलिलं वै समादधत्‌ ।। प्राड्मुखोदड्मुखो वापि अन्तर्जानुरुपस्मृशेत्‌ । सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यश: ।। वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न होते हैं। आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे। भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ।। अन्नेषु दन्‍्तलग्नेषु उच्छिष्ट: पुनराचमेत्‌ । विधिरेष समुद्दिष्ट: शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम्‌ ।। यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी। किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ।। शूद्रस्यैष विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमत: सतः । नित्यं चालुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना ।। यशस्कामेन भिक्षुभ्य: शूद्रेणात्महितार्थिना ।। (साधु-सेवाके उद्देश्यसे) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है। जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ।। क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विश: स्मृता: । शूद्रा: परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणा: ।। क्षत्रिय आस्मभ (उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं। वैश्योंके यज्ञमें हविष्य (हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ।। शुश्रूषाजीविन: शूद्रा वैश्या विपणजीविन: । अनिष्टनिग्रहा: क्षत्रा विप्रा: स्वाध्यायजीविन: ।। शूद्र सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।। तपसा शोभते विप्रो राजन्य: पालनादिशि: । आतिथ्येन तथा वैश्य: शूद्रो दास्येन शोभते ।। क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि-सत्कारसे और शाद्र सेवावृतिसे शोभा पाते हैं ।। यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव तु । कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ।। अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रकों सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ।। अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिन: । यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्म यथाश्रुतम्‌ ।। विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ।। त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रकों अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये। विशेषतः संन्यास-आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ।। आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णा भिक्षुकाश्रमम्‌ । प्रधानमिति मन्यन्ते शिष्टा: शास्त्रविनिशक्षये ।। शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ।। यच्चोपदिश्यते शिष्टै: श्रुतिस्मृतिविधानत: । तथा5<5स्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चित: ।। शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ।। अतोडन्यथा तु कुर्वाण: श्रेयो नाप्रोति मानव: । तस्माद्‌ भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ।। इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ।। इह यत्‌ कुरुते श्रेयस्तत्‌ प्रेत्य समुपाश्चुते । तच्चानसूयता कार्य कर्तव्यं यद्धि मन्यते ।। असूयता कृतस्येह फल दुःखादवाप्यते ।। मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मुत्युके पश्चात्‌ उसे प्राप्त होता है। जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोषदृष्टि न रखते हुए करे। दोषदृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगतमें बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ।। प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सर: । क्षमावान्‌ शीलसम्पन्न: सत्यधर्मपरायण: ।। आपदभावेन कुर्यद्धि शुश्रूषां भिक्षुका श्रमे ।। शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्या- द्ेषसे रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान्‌ तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे। आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर) उनकी सेवा करे ।। अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुस्तरम्‌ । संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशय: ।। निर्भयो देहमुत्सूज्य यास्यामि परमां गतिम्‌ । नात: परं ममास्त्यन्य एष धर्म: सनातन: ।। एवं संचिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना । कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम्‌ ।। “यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। यही सनातन धर्म है।” मन- ही-मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषा- धर्मका पालन करे ।। शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा । शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ।। शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ।। सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव च दर्शयेत्‌ यथा प्रीतो भवेद्‌ भिक्षुस्तथा कार्य प्रसाधयेत्‌ ।। यदकल्पं भवेद्‌ भिक्षोर्न तत्‌ कार्य समाचरेत्‌ । सभी कार्योमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे। जैसे-जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे। जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ।। यदाश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम्‌ ।। तत्‌ कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना । जो कार्य संन्यास-आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ।। मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत्‌ ।। स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत्‌ । आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तिना ।। मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे। जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिये। यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे। तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ।। नैशकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदित: । यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम्‌ ।। भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम्‌ । ब्रह्मपूर्वान्‌ गुरूंस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रिय: ।। तथा<<चार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम्‌ । स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्टवाभिवाद्य च ।। यो भवेत्‌ पूर्वसंसिद्धस्तुल्यधर्मा भवेत्‌ सदा । तस्मै प्रणाम: कर्तव्यो नेतरेषां कदाचन ।। रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे। फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे। इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल-समाचार पूछे। पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो। अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंकी कदापि नहीं ।। अनुकक्‍्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रत: । सम्मार्जनमथो कृत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम्‌ ।। संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाड़ू देकर आश्रमकी भूमिको लीप-पोत दे ।। ततः पुष्पबलिं दद्यात्‌ पुष्पाण्यादाय धर्मत: । निष्क्रम्यावस थात्‌ तूर्णमन्यत्‌ कर्म समाचरेत्‌ ।। तत्पश्चात्‌ धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ।। यथोपघातो न भवेत्‌ स्वाध्याये55श्रमिणां तथा । उपचघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते ।। आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे। जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ।। तथा>5त्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयु: । परिचारिकोऊहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृत: ।। किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम्‌ ।। अपने-आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों। शूद्रकों सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि “मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास-आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े-बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? (उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही) ।। भिक्षूणां गतरागाणां केवल ज्ञानदर्शिनाम्‌ । विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ।। “जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ।। तेषां प्रसादात्‌ तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम्‌ ।। एवमेतद्‌ विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान्‌ । विधिना यथोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम्‌ ।। “उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा निश्चय करके यदि शूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ।। न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा । इष्टां गतिमवाप्रोति यथा शुश्रूषकर्मणा ।। शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।। यादृशेन तु तोयेन शुद्धि प्रकुरुते नर: । तादृग्‌ भवति तद्धौतमुदकस्य स्वभावत: ।। मनुष्य जैसे जलसे कपड़ा धोता है, उस जलकी स्वच्छताके अनुसार ही वह वस्त्र स्वच्छ होता है ।। शूद्रो5प्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम्‌ । तादृग्‌ भवति संसर्गादचिरेण न संशय: ।। शूद्र भी इसी मार्गसे चलकर जैसे पुरुषका सेवन करता है, संसर्गवश वह शीघ्र वैसा हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। तस्मात्‌ प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना । अतः शूद्रको चाहिये कि अपने मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक संन्यासियोंकी सेवा करे ।। अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च ।। शुश्रूषां नियत: कुर्यात्‌ तेषामापदि यत्नतः । जो राह चलनेसे थके-माँदे कष्ट पा रहे हों तथा रोगसे पीड़ित हों, उन संन्यासियोंकी उस आपत्तिके समय यत्न और नियमके साथ विशेष सेवा करे ।। दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च ।। यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत्‌ । उनके कुशासन, मृगचर्म और भिक्षापात्रकी भी देखभाल करे तथा उनकी रुचिके अनुसार सारा कार्य करता रहे ।। प्रायक्षित्तं यथा न स्थात्‌ तथा सर्व समाचरेत्‌ ।। व्याधितानां तु प्रयत: चैलप्रक्षालनादिभि: । प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा । सब कार्य इस प्रकार सावधानीसे करे, जिससे कोई अपराध न बनने पावे। संन्यासी यदि रोगग्रस्त हो जायँ तो सदा उद्यत रहकर उनके कपड़े धोवे। उनके लिये ओषधि ले आवे तथा उनकी चिकित्साके लिये प्रयत्न करे ।। भिक्षाटनोडभिगच्छेत भिषजकश्न विपकश्षित: । ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत्‌ ।। भिक्षुक बीमार होनेपर भी भिक्षाटनके लिये जाय। विद्वान्‌ चिकित्सकोंके यहाँ उपस्थित हो तथा रोग-निवारणके लिये उपयुक्त विशुद्ध ओषधियोंका संग्रह करे ।। यश्व प्रीतमना दद्यादादद्याद्‌ भेषजं नर: । अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोज्याणि भिक्षुभि: ।। जो चिकित्सक प्रसन्नतापूर्वक ओषधि दे, उसीसे संन्यासीको औषध लेना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक दी हुई ओषधियोंको संन्यासी अपने उपयोगमें न ले ।। श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम्‌ | तस्योपभोगाद्‌ धर्म: स्याद्‌ व्याधिभिश्न निवर्त्यते ।। जो श्रद्धापूर्वक दी गयी और श्रद्धासे ही ग्रहण की गयी हो, उसी ओषधिके सेवनसे धर्म होता है और रोगोंसे छुटकारा भी मिलता है ।। आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद्‌ विधिपूर्वकम्‌ । न त्वेव धर्ममुत्सृज्य कुर्यात्‌ तेषां प्रतिक्रियाम्‌ ।। शूद्रको चाहिये कि जबतक यह शरीर छूट न जाय तबतक इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करता रहे। धर्मका उल्लंघन करके उन साधु-संन्यासियोंके प्रति विपरीत आचरण न करे ।। स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च । स्वभावत: सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च ।। सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मका: । शीत-उष्ण आदि सारे द्वद्ध स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं, समस्त पदार्थ स्वभावसे ही उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं। सारे त्रिगुणमय पदार्थ समुद्रकी लहरोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ।। विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्त्ववित्‌ तत्त्वदर्शन: ।॥। न स लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । जो बुद्धिमान्‌ एवं तत्त्वज्ञ पुरुष ऐसा जानता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले पद्मपत्रके समान पापसे लिप्त नहीं होता ।। एवं प्रयतितव्यं हि शुश्रूषार्थमतन्द्रितै: ।। सर्वाभिरुपसेवाभिस्तुष्यन्ति यतयो यथा । इस प्रकार शूद्रोंकी आलस्यशून्य होकर संन्यासियोंकी सेवाके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। वह सब प्रकारकी छोटी-बड़ी सेवाओंद्वारा ऐसी चेष्टा करे, जिससे वे संन्यासी सदा संतुष्ट रहें ।। नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैवमवधीरयेत्‌ ।। उत्तरं च न संदद्यात्‌ क्रुद्धं चैव प्रसादयेत्‌ । भिक्षुका अपराध कभी न करे, उसकी अवहेलना भी न करे, उसकी कड़ी बातका कभी उत्तर न दे और यदि वह कुपित हो तो उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे ।। श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रद्ृष्टवत्‌ ।। तृष्णीम्भावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत्‌ । सदा कल्याणकारी बात ही बोले और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म ही करे। संन्यासी कुपित हो तो उसके सामने चुप ही रहे, बातचीत न करे ।। लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परिपोषयेत्‌ । संन्यासीको चाहिये कि भाग्यसे कोई वस्तु मिले या न मिले, जो कुछ प्राप्त हो उसीसे जीवन-निर्वाह एवं शरीरका पोषण करे ।। कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारितः ।। स्थावरेषु दयां कुर्याज्जंगमेषु च प्राणिषु यथा55त्मनि तथान्येषु समां दृष्टिं निपातयेत्‌ ।। जो क्रोधी हो, उससे किसी वस्तुकी याचना न करे। जो ज्ञानसे द्वेष रखता हो, उससे भी कोई वस्तु न माँगे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंपर दया करे। जैसे अपने ऊपर उसी प्रकार दूसरोंपर समतापूर्ण दृष्टि डाले ।। पुण्यतीर्थानुसेवी च नदीनां पुलिनाश्रय: । शून्यागारनिकेतश्व वनवृक्षगुहाशय: ।। अरण्यानुचरो नित्यं वेदारण्यनिकेतन: । एकरात्र द्विरात्र वा न क्वचित्‌ सज्जते द्विज: ।। संन्यासी पुण्यतीर्थोंका निरन्तर सेवन करे, नदियोंके तटपर कुटी बनाकर रहे। अथवा सूने घरमें डेरा डाले। वनमें वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करे। सदा वनमें विचरण करे। वेदरूपी वनका आश्रय ले, किसी भी स्थानमें एक रात या दो रातससे अधिक न रहे। कहीं भी आसक्त न हो ।। शीर्णपर्णपुटे वापि वन्ये चरति भिक्षुक: । न भोगार्थमनुप्रेत्य यात्रामात्र॑ं समश्षुते ।। संन्यासी जंगली फल-मूल अथवा सूखे पत्तेका आहार करे। वह भोगके लिये नहीं, शरीरयात्राके निर्वाहके लिये भोजन करे ।। धर्मलब्धं समश्नाति न कामान्‌ किंचिदकश्षुते । युगमात्रदृगध्वानं क्रोशादूर्ध्व न गच्छति ।। वह धर्मतः प्राप्त अन्नका ही भोजन करे। कामना-पूर्वक कुछ भी न खाय। रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगेतककी भूमिपर ही दृष्टि रखे और एक दिनमें एक कोससे अधिक न चले ।। समो मानापमानाभ्यां समलोष्टाश्मकाञछ्चन: । सर्वभूताभयकरस्तथैवा भयदक्षिण: ।। मान हो या अपमान--वह दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे रहे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको एक समान समझे। समस्त प्राणियोंको निर्भय करे और सबको अभयकी दक्षिणा दे ।। निर्दन्दों निर्नमस्कारो निरानन्दपरिग्रह: । निर्ममो निरहंकार: सर्वभूतनिराश्रय: ।। शीत-उष्ण आदि द्वद्धोंसे निर्विकार रहे, किसीको नमस्कार न करे। सांसारिक सुख और परिग्रहसे दूर रहे। ममता और अहंकारको त्याग दे। समस्त प्राणियोंमेंसे किसीके भी आश्रित न रहे ।। परिसंख्यानतत्त्वज्ञस्तथा सत्यरति: सदा । ऊर्ध्व नाधो न तिर्यक्‌ च न किंचिदभिकामयेत्‌ ।। वस्तुओंके स्वरूपके विषयमें विचार करके उनके तत्त्वको जाने। सदा सत्यमें अनुरक्त रहे। ऊपर, नीचे या अगल-बगलमें कहीं किसी वस्तुकी कामना न करे ।। एवं संचरमाणस्तु यतिधर्म यथाविधि । कालस्य परिणामात्‌ तु यथा पक्‍्वफलं तथा ।। स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद्‌ ब्रह्म शाश्वतम्‌ । इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्मका पालन करनेवाला संन्यासी कालके परिणामवश अपने शरीरको पके हुए फलकी भाँति त्यागकर सनातन ब्रह्ममें प्रविष्ट हो जाता है ।। निरामयमनाद्यन्तं गुणसौम्यमचेतनम्‌ ।। निरक्षरमबीजं च निरिन्द्रियमजं तथा | अजय्यमक्षरं यत्‌ तदभेद्यं सूक्ष्ममेव च ।। निर्गुणं च प्रकृतिमन्निर्विकारं च सर्वश: । भूतभव्यभविष्यस्य कालस्य परमेश्वरम्‌ ।। अव्यक्तं पुरुष क्षेत्रमानन्त्याय प्रपद्यते । वह ब्रह्म निरामय, अनादि, अनन्त, सौम्यगुणसे युक्त, चेतनासे ऊपर उठा हुआ, अनिर्वचनीय, बीजहीन, इन्द्रियातीत, अजन्मा, अजेय, अविनाशी, अभेद्य, सूक्ष्म, निर्मुण, सर्वशक्तिमान्‌, निर्विकार, भूत, वर्तमान और भविष्य कालका स्वामी तथा परमेश्वर है। वही अव्यक्त, अन्तर्यामी पुरुष और क्षेत्र भी है। जो उसे जान लेता है, वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।। एवं स भिशक्षुर्निर्वा्ण प्राप्तुयाद्‌ दग्थकिल्बिष: ।। इहस्थो देहमुत्सज्य नीडं शकुनिवद्‌ यथा । इस प्रकार वह भिक्षु घोंसला छोड़कर उड़ जानेवाले पक्षीकी भाँति यहीं इस शरीरको त्यागकर समस्त पापोंको ज्ञानाग्निसे दग्ध कर देनेके कारण निर्वाण--मीक्ष प्राप्त कर लेता है।। यत्‌ करोति यदश्नाति शुभं वा यदि वाशुभम्‌ ।। नाकृतं भुज्यते कर्म न कृतं नश्यते फलम्‌ । मनुष्य जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका वैसा ही फल भोगता है। बिना किये हुए कर्मका फल किसीको नहीं भोगना पड़ता है तथा किये हुए कर्मका फल भोगके बिना नष्ट नहीं होता है ।। शुभकर्मसमाचार: शुभमेवाप्लुते फलम्‌ ।। तथाशुभसमाचारो हाशुभं समवाप्तुते । जो शुभ कर्मका आचरण करता है, उसे शुभ फलकी ही प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फलका ही भागी होता है ।। तथा शुभसमाचारो हाशुभानि विवर्जयेत्‌ ।। शुभान्येव समादद्याद्‌ य इच्छेद्‌ भूतिमात्मन: । अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ-कर्मोंका ही आचरण करे। अशुभ कर्मोको त्याग दे। ऐसा करनेसे वह शुभ फलोंको ही प्राप्त करेगा ।। तस्मादागमसम्पन्नो भवेत्‌ सुनियतेन्द्रिय: ।। शकक्‍्यते हागमादेव गतिं प्राप्तुमनामयाम्‌ । मनुष्यको चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हो। शास्त्रके ज्ञानसे ही मनुष्यको अनामय गतिकी प्राप्ति हो सकती है ।। परा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधव: ।। यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दुः:खमनन्‍्तकम्‌ | साधु पुरुष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परमगति शास्त्रोंमें देखी गयी है। जहाँ पहुँचकर मनुष्य अनन्त दुःखका परित्याग करके अमृतत्वको प्राप्त कर लेता है ।। इमं हि धर्ममास्थाय ये5पि स्यु: पापयोनय: ।। स्त्रियों वैश्याश्व शूद्राश्न प्राप्तुयु: परमां गतिम्‌ । इस धर्मका आश्रय लेकर पापयोनिमें उत्पन्न हुए पुरुष तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं ।। किं पुनर्ब्राह्मणो विद्वान्‌ क्षत्रियो वा बहुश्रुतः ।। न चाप्यक्षीणपापस्य ज्ञानं भवति देहिन: । ज्ञानोपलब्धिर्भवति कृतकृत्यो यदा भवेत्‌ ।। फिर जो दिद्वान्‌ ब्राह्मण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सदगतिके विषयमें क्या कहना है। जिस देहधारीके पाप क्षीण नहीं हुए हैं, उसे ज्ञान नहीं होता। जब मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है ।। उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाप्पनसूयक: । तथैव वर्तेद्‌ गुरुषु भूयांसं वा समाहित: ।। ज्ञान या विज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर भी दोषदृष्टिसे रहित हो गुरुजनोंके प्रति पहले ही- जैसा सद्भाव रखे। अथवा एकाग्रचित्त होकर पहलेसे भी अधिक श्रद्धाभाव रखे ।। यथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्तते व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत्‌ ।। शिष्य जिस तरह गुरुका अपमान करता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्योंके प्रति बर्ताव करता है। अर्थात्‌ शिष्यको अपने कर्मके अनुसार फल मिलता है। गुरुका अपमान करनेवाले शिष्यका किया हुआ वेद-शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञानरूपमें परिणत हो जाता है ।। गतिं चाप्यशुभां गच्छेन्निरयाय न संशय: । प्रक्षीयते तस्य पुण्यं ज्ञानमस्य विरुध्यते ।। वह नरकमें जानेके लिये अशुभ मार्गको ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है ।। अदृष्टपूर्वकल्याणो यथादृष्टविधिर्नर: ।। उत्सेकान्मोहमापसद्य तत्त्वज्ञानं न चाप्तुयात्‌ । जिसने पहले कभी कल्याणका दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधिको न देखनेके कारण अभिमानवश मोहको प्राप्त हो जाता है। अतः उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती ।। एवमेव हि नोत्सेक: कर्तव्यो ज्ञानसम्भव: ।। फल ज्ञानस्य हि शम: प्रशमाय यतेत्‌ सदा । अत: किसीको भी ज्ञानका अभिमान नहीं करना चाहिये। ज्ञानका फल है शान्ति, इसलिये सदा शान्तिके लिये ही प्रयत्न करे ।। उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा ।। शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता । मनका निग्रह और इन्द्रियोंका संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरुजनोंकी सेवा करनी चाहिये ।। धृत्या शिक्षोदरं रक्षेत्‌ पाणिपादं च चक्षुषा ।। इन्द्रियार्थाश्न मनसा मनो बुद्धौं समादधेत्‌ । धैर्यके द्वारा उपस्थ और उदरकी रक्षा करे। नेत्रोंके द्वारा हाथ और पैरोंकी रक्षा करे। मनसे इन्द्रियोंक विषयोंको बचावे और मनको बुद्धिमें स्थापित करे ।। धृत्या5डसीत ततो गत्वा शुद्धदेशं सुसंवृतम्‌ ।। लब्ध्वा5डसनं यथादृष्टं विधिपूर्व समाचरेत्‌। पहले शुद्ध एवं घिरे हुए स्थानमें जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठे और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ध्यानके लिये प्रयत्न करे ।। ज्ञानयुक्तस्तथा देवं हृदिस्थमुपलक्षयेत्‌ ।। आदीप्यमानं वपुषा विधूममनलं यथा । रश्मिमन्तमिवादित्यं वैद्युताग्निमिवाम्बरे ।। संस्थितं हृदये पश्येदीशं शाश्वतमव्ययम्‌ | विवेकयुक्त साधक अपने हृदयमें विराजमान परमात्मदेवका साक्षात्कार करे। जैसे आकाशकमें विद्युतका प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणोंवाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्मदेवको धूमरहित अग्निकी भाँति तेजस्वी स्वरूपसे प्रकाशित देखे। हृदयदेशमें विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्वरका बुद्धिरूपी नेत्रोंके द्वारा दर्शन करे ।। न चायुक्तेन शक्‍्यो<यं द्रष्टूं देहे महेश्वरः ।। युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि । जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस महेश्वरका साक्षात्कार नहीं कर सकता। योगयुक्त पुरुष ही मनको हृदयमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उस अन्तर्यामी परमात्माका दर्शन करता है ।। अथ त्वेवं न शकनोति कर्तु हृदयधारणम्‌ ।। यथासांख्यमुपासीत यथावद्‌ योगमास्थित: । यदि इस प्रकार हृदयदेशमें ध्यान-धारणा न कर सके तो यथावत्रूपसे योगका आश्रय ले सांख्यशास्त्रके अनुसार उपासना करे ।। पज्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि ।। पज्च भूतविशेषाश्च मनश्वैव तु षोडश । इस शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत और सोलहवाँ मन--ये सोलह विकार हैं ।। तन्मात्राण्यपि पञ्चैव मनो5हंकार एव च || अष्टमं चाप्यथाव्यक्तमेता: प्रकृतिसंज्ञिता: । पाँच तन्मात्राएँ, मन, अहंकार और अव्यक्त--ये आठ प्रकृतियाँ हैं ।। एता: प्रकृतयश्चाष्टी विकाराश्चनापि षोडश ।। एवमेतदिहस्थेन विज्ञेयं तत्त्वबुद्धिना । एवं वर्ष्म समुत्तीर्य तीर्णो भवति नान्यथा ।। ये आठ प्रकृतियाँ और पूर्वोक्त सोलह विकार--इन चौबीस तत्त्वोंको यहाँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको जानना चाहिये। इस प्रकार प्रकृति-पुरुषका विवेक हो जानेसे मनुष्य शरीरके बन्धनसे ऊपर उठकर भवसागरसे पार हो जाता है, अन्यथा नहीं ।। परिसंख्यानमेवैतन्मन्तव्यं ज्ञानबुद्धिना । अहन्यहनि शान्तात्मा पावनाय हिताय च ।। एवमेव प्रसंख्याय तत्त्वबुद्धिर्विमुच्यते । ज्ञानयुक्त बुद्धिवाले पुरुषको यही सांख्ययोग मानना चाहिये। प्रतिदिन शान्तचित्त हो अपने अन्तःकरणको पवित्र बनाने और अपना हित-साधन करनेके लिये इसी प्रकार उपर्युक्त तत्त्वोंका विचार करनेसे मनुष्यको यथार्थ तत्त्वका बोध हो जाता है और वह बन्धनसे छूट जाता है ।। निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्त्वार्थतत्त्ववित्‌ ।। शुद्ध तत्त्वार्थको तत्त्वसे जाननेवाला पुरुष अवयवरहित द्वितीय ब्रह्म हो जाता है ।। सत्संनिकर्षे परिवर्तितव्यं विद्याधिकाश्चापि निषेवितव्या: | सवर्णतां गच्छति संनिकर्षा- न्नील: खगो मेरुमिवाश्रयन्‌ वै ।॥। मनुष्यको सेदा सत्पुरुषोंके समीप रहना चाहिये। विद्यामें बड़े-चढ़े पुरुषोंका सेवन करना चाहिये। जो जिसके निकट रहता है, उसके समान वर्णका हो जाता है। जैसे नील पक्षी मेरु पर्वतका आश्रय लेनेसे सुवर्णके समान रंगका हो जाता है ।। भीष्म उवाच इत्येवमाख्याय महामुनिस्तदा चतुर्षु वर्णेषु विधानमर्थवित्‌ । शुश्रूषया वृत्तगतिं समाधिना समाधियुक्तः प्रययौ स्वमाश्रमम्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्छिर! शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले महामुनि पराशर इस प्रकार चारों वर्णोके लिये कर्तव्यका विधान बताकर तथा शुश्रूषा और समाधिसे प्राप्त होनेवाली गतिका निरूपण करके एकाग्रचित्त हो अपने आश्रमको चले गये ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) ऑपन--माज बछ। अप ऋाल> [सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं--इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद] युधिछिर उवाच केषां देवा महाभागा: संनमन्ते महात्मनाम्‌ । लोकेडस्मिंस्तानृषीन्‌ सर्वान्‌ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! इस लोकमें महाभाग देवता किन महात्माओंको मस्तक झुकाते हैं? मैं उन समस्त ऋषियोंका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच इतिहासमिमं विप्रा: कीर्तयन्ति पुराविद: । अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञास्तं निबोध युधिष्ठिर ।। भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले महाज्ञानी ब्राह्मण इस इतिहासका वर्णन करते हैं। तुम उस इतिहासको सुनो ।। वृत्रं हत्वाप्युपावृत्तं त्रिदशानां पुरस्कृतम्‌ | महेन्द्रमनुसम्प्राप्तं स्तूयमानं महर्षिभि: ।। श्रिया परमया युक्त रथस्थं हरिवाहनम्‌ । मातलि: प्राञ्जलि भूत्वा देवमिन्द्रमुवाच ह ।। जब इन्द्र वृत्रासुरको मारकर लौटे, उस समय देवता उन्हें आगे करके खड़े थे। महर्षिगण महेन्द्रकी स्तुति करते थे। हरित वाहनोंवाले देवराज इन्द्र रथपर बैठकर उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रहे थे। उसी समय मातलिने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रसे कहा ।। मातलिरुवाच नमस्कृतानां सर्वेषां भगवंस्त्वं पुरस्कृत: । येषां लोके नमस्कुर्यात्‌ तान्‌ ब्रवीतु भवान्‌ मम ।। मातलि बोले--भगवन्‌! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओंके आप अगुआ हैं; परन्तु आप भी इस जगतमें जिनको मस्तक झुकाते हैं, उन महात्माओंका मुझे परिचय दीजिये ।। भीष्म उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा देवराज: शचीपति: । यन्तारं परिपृच्छन्तं तमिन्द्र: प्रत्युवाच ह ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! मातलिकी वह बात सुनकर शचीपति देवराज इन्द्रने उपर्युक्त प्रश्न पूछनेवाले अपने सारथिसे इस प्रकार कहा ।। इन्द्र उवाच धर्म चार्थ च काम॑ च येषां चिन्तयतां मति: | नाधर्मे वर्तते नित्यं तान्‌ नमस्यामि मातले ।। इन्द्र बोले--मातले! धर्म, अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्‍्हींको नमस्कार करता हूँ ।। ये रूपगुणसम्पन्ना: प्रमदाह्दयंगमा: । निवृत्ता: कामभोगेषु तान्‌ नमस्यामि मातले ।। मातले! जो रूप और गुणसे सम्पन्न हैं तथा युवतियोंके हृदय-मन्दिरमें हठात्‌ प्रवेश कर जाते हैं--अर्थात्‌ जिन्हें देखते ही युवतियाँ मोहित हो जाती हैं, ऐसे पुरुष यदि काम-भोगसे दूर रहते हैं तो मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ।। स्वेषु भोगेषु संतुष्टा: सुवाचो वचनक्षमा: । अमानकामारश्नार्ष्याहस्तान्‌ नमस्यामि मातले ।। मातले! जो अपनेको प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट हैं--दूसरोंसे अधिककी इच्छा नहीं रखते। जो सुन्दर वाणी बोलते हैं और प्रवचन करनेमें कुशल हैं, जिनमें अहंकार और कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे अर्घ्य पानेके योग्य हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ ।। धनं विद्यास्तथैश्वर्य येषां न चलयेन्मतिम्‌ । चलितां ये निगृह्नन्ति तान्‌ नित्यं पूजयाम्यहम्‌ ।। धन, विद्या और ऐश्वर्य जिनकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते तथा जो चंचल हुई बुद्धिको भी विवेकसे काबूमें कर लेते हैं, उनकी मैं नित्य पूजा करता हूँ ।। इष्टेदरिरुपेतानां शुचीनामाग्निहोत्रिणाम्‌ । चतुष्पादकुट॒म्बानां मातले प्रणमाम्यहम्‌ ।। मातले! जो प्रिय पत्नीसे युक्त हैं, पवित्र आचार-विचारसे रहते हैं, नित्य अग्निहोत्र करते हैं और जिनके कुटु॒म्बमें चौपायों (गौ आदि पशुओं) का भी पालन होता है, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।। येषामर्थस्तथा कामो धर्ममूलविवर्धित: । धर्मार्थी यस्य नियतौ तान्‌ नमस्यामि मातले ।। मातले! जिनका अर्थ और काम धर्ममूलक होकर वृद्धिको प्राप्त हुआ है तथा जिसके धर्म और अर्थ नियत हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ।। धर्ममूलार्थकामानां ब्राह्मणानां गवामपि | पतिव्रतानां नारीणां प्रणाम प्रकरोम्पहम्‌ ।। धर्ममूलक धनकी कामना रखनेवाले ब्राह्मणोंको तथा गौओं और पतिव्रता नारियोंको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।। ये भुक्त्वा मानुषान्‌ भोगान्‌ पूर्वे ववसि मातले । तपसा स्वर्गमायान्ति शश्चत्‌ तान्‌ पूजयाम्यहम्‌ ।। मातले! जो जीवनकी पूर्व अवस्थामें मानवभोगोंका उपभोग करके तपस्याद्वारा स्वर्गमें आते हैं, उनका मैं सदा ही पूजन करता हूँ ।। असम्भोगान्न चासक्तान्‌ धर्मनित्याज्जितेन्द्रियान्‌ । संन्यस्तानचलप्रख्यान्‌ मनसा पूजयामि तान्‌ ।। जो भोगोंसे दूर रहते हैं, जिनकी कहीं भी आसक्ति नहीं है, जो सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं, जो सच्चे संन्यासी हैं और पर्वतोंके समान कभी विचलित नहीं होते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंकी मैं मनसे पूजा करता हूँ ।। ज्ञानप्रसन्नविद्यानां निरूढं धर्ममिच्छताम्‌ । परै: कीर्तितशौचानां मातले तान्‌ नमाम्यहम्‌ ।। मातले! जिनकी विद्या ज्ञानके कारण स्वच्छ है, जो सुप्रसिद्ध धर्मके पालनकी इच्छा रखते हैं तथा जिनके शौचाचारकी प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) ऑपन--माज बछ। अि>-छऋाझ [सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य] युधिछिर उवाच संस्कृतानां तटाकानां यत्‌ फल कुरुपुंगव । तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोड्द्य भरतर्षभ ।। युधिष्ठिरने कहा--कुरुपुंगव! भरतश्रेष्ठ! सरोवरोंके बनानेका जो फल है, उसे आज मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच सुप्रदर्शो धनपतिश्रित्रधातुविभूषित: । त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजितो यस्तटाकवान्‌ ।। भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जो तालाब बनवाता है वह पुरुष विचित्र धातुओंसे विभूषित धनाध्यक्ष कुबेरके समान दर्शनीय है। वह तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजित होता है ।। इह चामुत्र सदन पुत्रीयं वित्तवर्धनम्‌ । कीर्तिसंजनन श्रेष्ठ तटाकानां निवेशनम्‌ ।। तालाबका संस्थापन श्रेष्ठ एवं कीर्तिजनक है। वह इस लोक और परलोकमें भी उत्तम निवासस्थान है। वह पुत्रका घर तथा धनकी वृद्धि करनेवाला है ।। धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिण: । तटाकं सुकृतं देशे क्षेत्रे देशसमा श्रयम्‌ ।। मनीषी पुरुषोंने सरोवरोंको धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला बताया है। तालाब देशमें मूर्तिमान्‌ पुण्यस्वरूप है और क्षेत्रमें देशका भारी आश्रय है ।। चतुर्विधानां भूतानां तटाकमुपलक्षये । तटाकानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम्‌ ।। मैं तालाबको चारों (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) प्रकारके प्राणियोंके लिये उपयोगी देखता हूँ। जगतमें जितने भी सरोवर हैं, वे सभी उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ।। देवा मनुष्या गन्धर्वा: पितरोरगराक्षसा: । स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम्‌ ।। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर भूत--ये सभी जलाशयका आश्रय लेते हैं ।। तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तटाके ये गुणा: स्मृता: । या च तत्र फलप्राप्ती ऋषिभि: समुदाहता ।। अतः: सरोवर खोदवानेमें जो गुण हैं, उन सबका मैं तुमसे वर्णन करूँगा तथा ऋषियों ने तालाब खोदानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतायी है, उनका भी परिचय दे रहा हूँ ।। वर्षमात्रं तटाके तु सलिल॑ यत्र तिष्ठति । अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिण: ।। जिस सरोवरमें एक वर्षतक पानी ठहरता है, उसका फल मनीषी पुरुषोंने अग्निहोत्र बताया है अर्थात्‌ उसे खोदानेवालेको प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेका पुण्य प्राप्त होता है ।। निदाघकाले सलिलं तटाके यस्य तिष्ठति । वाजपेयफलं तस्य फल॑ वै ऋषयोडब्रुवन्‌ ।। जिसके तालाबमें गर्मीभर जल रहता है, उसके लिये ऋषियोंने वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ।। सकुलं॑ तारयेद्‌ वंशं यस्य खाते जलाशये । गाव: पिबन्ति पानीयं साधवश्ल नस: सदा ।। जिसके खोदवाये हुए सरोवरमें सदा साधुपुरुष तथा गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने कुलको तार देता है ।। तटाके यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम्‌ | मृगपक्षिमनुष्याश्व॒ सो5श्वमेधफलं लभेत्‌ ।। जिसके जलाशयमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा तृषित मृग, पक्षी एवं मनुष्य अपनी प्यास बुझाते हैं, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ।। यत्‌ पिबन्ति जल तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च । तटाककर्तुस्तत्‌ सर्व प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ।। मनुष्य उस तालाबमें जो जल पीते, स्नान करते और तटपर विश्राम लेते हैं, वह सारा पुण्य सरोवर बनवानेवालेको परलोकमें अक्षय होकर मिलता है ।। दुर्लभ॑ सलिलं तात विशेषेण परंतप । पानीयस्य प्रदानेन सिद्धिर्भवति शाश्वती ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले तात! जल विशेषरूपसे दुर्लभ वस्तु है; अतः जलदान करनेसे शाश्वत सिद्धि प्राप्त होती है ।। तिलान्‌ ददत पानीयं दीपमन्नं प्रतिश्रयम्‌ । बान्धवै: सह मोदथध्वमेतत्‌ प्रेतेषु दुर्लभम्‌ ।। तिल, जल, दीप, अन्न और रहनेके लिये घर दान करो, तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ सदा आनन्दित रहो, क्योंकि ये सब वस्तुएँ मरे हुओंके लिये दुर्लभ हैं ।। सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते । पानीयं नरशार्दूल तस्माद्‌ दातव्यमेव हि ।। नरश्रेष्ठ जलका दान सभी दानोंसे गुरुतर है। वह समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य ही करना चाहिये ।। एवमेतत्‌ तटाकेषु कीर्तितं फलमुत्तमम्‌ । अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामपि रोपणे ।। इस प्रकार यह सरोवर खोदानेका उत्तम फल बताया गया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ।। स्थावराणां तु भूतानां जातय: षट्‌ प्रकीर्तिता: । वृक्षगुल्मलतावलल्‍ल्यस्त्वक्सारतृणवीरुध: ।। एता जात्यस्तु वृक्षाणामेषां रोपगुणास्त्विमे । स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं--वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण, वीरुध--ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। इनके लगानेसे ये-ये गुण बताये गये हैं ।। पनसाम्रादयो वृक्षा गुल्मा मन्दारपूर्वका: ।। नागिकामलियावलल्‍ल्यो मालतीत्यादिका लता: । वेणुक्रमुकत्वक्सारा: सस्यानि तृणजातय: ।। कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं। मन्दार आदि गुल्म कोटियमें माने गये हैं। नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं। मालती आदि लताएँ हैं। बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं। खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ।। कीर्तिश्व मानुषे लोके प्रेत्य चैव शुभं फलम्‌ | लभ्यते नाकपृषछ्ठे च पितृभिश्व महीयते ।। देवलोकगतस्यापि नाम तस्य न नश्यति । अतीतानागतांश्वैव पितृवंशांश्न भारत ।। तारयेद्‌ वृक्षरोपी तु तस्माद्‌ वक्षान्‌ प्ररोपयेत्‌ । भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है। देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता। वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आनेवाली संतानोंको भी तार देता है। अत: वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ।। तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र संशय: ।। परलोकगत: स्वर्गे लोकांश्षाप्रोति सोडव्ययान्‌ । जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।। पुष्प: सुरगणान्‌ वृक्षा: फलैश्वापि तथा पितृन्‌ ।। छायया चातिथींस्तात पूजयन्ति महीरुहा: । तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ।। किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवा: ।। तथा ऋषिगणाश्रैव संश्रयन्ते महीरुहान्‌ । किन्नर, नाग, राक्षस, देव, गन्धर्व, मनुष्य तथा ऋषिगण भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ।। पुष्पिता: फलवन्तश्न तर्पयन्तीह मानवान्‌ ।। वृक्षदान्‌ पुत्रवद्‌ वृक्षा: तारयन्ति परत्र च । तस्मात्‌ तटाके वृक्षा वै रोप्या: श्रेयोडर्थिना सदा ।। फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्ष इस जगतमें मनुष्योंको तृप्त करते हैं। जो वृक्ष दान करते हैं, उनके वे वृक्ष परलोकमें पुत्रकी भाँति पार उतारते हैं। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही सरोवरके किनारे वृक्ष लगाना चाहिये ।। पुत्रवत्‌ परिरक्ष्याक्ष पुत्रास्ते धर्मत: स्मृता: । तटाककृद्‌ वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्व यो द्विज: ।। एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिन: । वृक्ष लगाकर उनकी पुत्रोंकी भाँति रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वे धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो तालाब बनवाता है और जो उसके किनारे वृक्ष लगाता है, जो द्विज यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा दूसरे जो लोग सत्यभाषण करनेवाले हैं--वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं ।। तस्मात्‌ तटाकं कुर्वीत आरामांश्वापि योजयेत्‌ ।। यजेच्च विविधैर्यज्ञै: सत्यं च विधिवद्‌ वदेत्‌ । इसलिये सरोवर खोदावे और उसके तटपर बगीचे भी लगावे। सदा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करे और विधिपूर्वक सत्य बोले ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहदानप्रशंसा नाम षण्णवतितमो<ध्याय:

yudhiṣṭhira uvāca |

śūdrāṇām iha śuśrūṣā nityam evānvarṇitā |

kaiḥ kāraṇaiḥ katividhā śuśrūṣā samudāhṛtā ||

ke ca śuśrūṣayā lokā vihitā bharatarṣabha |

śūdrāṇāṃ bharataśreṣṭha brūhi me dharmalakṣaṇam ||

bhīṣma uvāca |

atrāpy udāharantīmam itihāsaṃ purātanam |

śūdrāṇām anukampārthaṃ yad uktaṃ brahmavādinā ||

ยุธิษฐิระทูลถามว่า “ปิตามหะ! ในโลกนี้กล่าวกันเสมอว่า ‘การปรนนิบัติรับใช้’ (ศุศฺรูษา) แก่ทวิชะเป็นธรรมอันยิ่งสำหรับศูทร. ด้วยเหตุใดจึงสอนการรับใช้นั้น และกล่าวว่ามีกี่ประการ? และด้วยการรับใช้นั้น ศูทรถูกกำหนดให้ได้ไปสู่โลก (คติ) ใดบ้าง? โอ้ผู้เป็นโคแห่งวงศ์ภารตะ โอ้ผู้ประเสริฐแห่งภารตะ โปรดบอกลักษณะของธรรมนี้แก่ข้าพเจ้าเถิด.” ภีษมะกล่าวว่า “ในเรื่องนี้ด้วย เขายกอุทาหรณ์เป็นตำนานโบราณ—ถ้อยคำที่พราหมวาทินผู้หนึ่งกล่าวด้วยความกรุณาต่อศูทร.”

युधिष्ठिरःYudhiṣṭhira
युधिष्ठिरः:
Karta
TypeNoun
Rootयुधिष्ठिर (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच् (धातु)
FormPerfect (Liṭ), 3rd, Singular
शूद्राणाम्of Śūdras
शूद्राणाम्:
TypeNoun
Rootशूद्र (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Genitive, Plural
इहhere, in this world
इह:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootइह
शुश्रूषाservice, attendance
शुश्रूषा:
Karta
TypeNoun
Rootशुश्रूषा (प्रातिपदिक)
FormFeminine, Nominative, Singular
नित्यम्always
नित्यम्:
TypeIndeclinable
Rootनित्य (प्रातिपदिक)
एवindeed, only
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
अनुवर्णिताhas been described
अनुवर्णिता:
TypeVerb
Rootअनु-वर्ण् (धातु) → अनुवर्णित (कृदन्त)
FormPassive, Past participle (kta), Feminine, Nominative, Singular
कैःby what (causes/means)
कैः:
Karana
TypePronoun
Rootकिम् (सर्वनाम-प्रातिपदिक)
FormMasculine/Neuter, Instrumental, Plural
कारणैःby reasons/causes
कारणैः:
Karana
TypeNoun
Rootकारण (प्रातिपदिक)
FormNeuter, Instrumental, Plural
कति-विदाof how many kinds
कति-विदा:
TypeAdjective
Rootकति (अव्यय/संख्या-प्रातिपदिक) + विधा (प्रातिपदिक)
FormFeminine, Nominative, Singular
शुश्रूषाservice
शुश्रूषा:
Karta
TypeNoun
Rootशुश्रूषा (प्रातिपदिक)
FormFeminine, Nominative, Singular
समुदाह्वताhas been declared/called
समुदाह्वता:
TypeVerb
Rootसम्-उद्-आह्वा (धातु) → समुदाह्वत (कृदन्त)
FormPassive, Past participle (kta), Feminine, Nominative, Singular

भीष्म उवाच

Y
Yudhiṣṭhira
B
Bhīṣma
Ś
Śūdras
D
Dvijas (twice-born; implied)
B
Bharata lineage (Bharatarṣabha, Bharataśreṣṭha)
B
Brahmavādin (unnamed here; later tradition identifies Parāśara in the extended passage)