Puṣkara-Śapatha Itihāsa (Agastya–Indra Dispute at the Tīrthas) | पुष्कर-शपथ-आख्यानम्
०४८ श्यु 8 त्रिनववतितमो<्थ्याय: गृहस्थके धर्मोका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत युधिछिर उवाच द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते । अन्न ब्राह्गकामाय कथमेतत् पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि व्रतधारी विप्र किसी ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसके घर श्राद्धका अन्न भोजन कर ले तो इसे आप कैसा मानते हैं? (अपने व्रतका लोप करना उचित है या ब्राह्मणकी प्रार्थना अस्वीकार करना)
yudhiṣṭhira uvāca | dvijātayo vratopetā havis te yadi bhuñjate | annaṃ brāhma-kāmāya katham etat pitāmaha ||
ยุธิษฐิระกล่าวว่า “ท่านปิตามหะ! หากเหล่าทวิชผู้ถือพรตยอมรับประทานอาหารบูชา—หวิษยะ/อาหารศราทธ์—เพื่อสนองคำขอของพราหมณ์ ควรตัดสินอย่างไร? ในกรณีนี้สิ่งใดสมควรยิ่ง—รักษาพรตให้บริสุทธิ์ไม่บกพร่อง หรือยอมตามความประสงค์ของพราหมณ์ด้วยความเคารพและหน้าที่?”
युधिछिर उवाच