Brāhmaṇa-vandana: Criteria for Veneration, Disciplined Speech, and Protective Kingship (अनुशासनपर्व, अध्याय ८)
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कर्मफलका उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,सम्यगुच्चरिता वाच: श्रूयन्ते हि युधिष्ठिर । शुश्रूषमाणे नृपतौ प्रेत्य चेह सुखावहा: जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं
samyag-uccaritā vācaḥ śrūyante hi yudhiṣṭhira | śuśrūṣamāṇe nṛpatau pretya ceha sukhāvahāḥ ||
ภีษมะกล่าวว่า “โอ้ยุธิษฐิระ! วาจาที่เปล่งออกอย่างถูกต้องย่อมถูกรับฟังและได้รับการยกย่อง เมื่อพระราชาปรารถนาจะฟัง วาจาที่กล่าวอย่างเหมาะสมเช่นนั้นย่อมเป็นเหตุแห่งความสุขทั้งในโลกนี้และหลังความตาย เพราะฉะนั้นเราจึงนับถือพราหมณ์ผู้ศึกษาด้วยความนอบน้อม สำรวมอินทรีย์ พูดจาอ่อนหวาน เพียบพร้อมทั้งศาสตรญาณและความประพฤติชอบ รู้แจ้งปรมาตมันอันไม่เสื่อมสลาย—ผู้ซึ่งวาจาทุ้มลึกดั่งเมฆคำราม มีความหมายเป็นมงคล และทำให้สภารื่นรมย์ดุจเสียงฝูงหงส์”
भीष्म उवाच