येषां स्वादूनि भोज्यानि समवेक्ष्यन्ति बालका: । नाश्नन्ति विधिवत् तानि कि नु पापतरं तत:,जिसके स्वादिष्ट भोजनकी ओर छोटे-छोटे बच्चे तरसती आँखोंसे देखते हों और वह उन्हें न्न्यायतः खानेको न मिलता हो, उस पुरुषके द्वारा इससे बढ़कर पाप और क्या हो सकता है?
เมื่อเด็กเล็กๆ จ้องมองอาหารอันโอชะด้วยสายตาอาวรณ์ แต่กลับไม่ได้รับให้กินโดยชอบธรรม—จะมีบาปใดเลวร้ายยิ่งกว่านี้เล่า?
भीष्म उवाच