दैव–पुरुषकार-प्रश्नः
Daiva–Puruṣakāra Inquiry: Fate and Human Effort
कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते । एवं त्रिदशलोके<पि प्राप्यन्ते बहवो गुणा:,दैवके बिना पुरुषार्थकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि प्रवृत्तिका मूल कारण दैव ही है (जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्यकर्म किये हैं, वे ही दूसरे जन्ममें भी पूर्वसंस्कारवश पुण्यमें प्रवृत्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो सभी पुण्यकर्मोंमें ही लग जायँ)। देवलोकमें भी दैववश ही बहुत-से गुण (सुखद साधन) उपलब्ध होते हैं
kathaṁ tasya samutpattir yato daivaṁ pravartate | evaṁ tridaśa-loke ’pi prāpyante bahavo guṇāḥ ||
ภีษมะกล่าวว่า—เมื่อชะตาเป็นผู้ขับเคลื่อนการกระทำแล้ว ความเพียรของมนุษย์จะเกิดขึ้นโดยไม่อาศัยชะตาได้อย่างไร? ฉันนั้น แม้ในโลกแห่งเทพ (ตริทศโลก) คุณวิเศษและความเกื้อหนุนมากมายก็ได้มาด้วยอำนาจแห่งชะตา
भीष्म उवाच