Devaśarmā–Vipula Dialogue on Ahorātra–Ṛtu as Moral Witnesses (अनुशासन पर्व, अध्याय ४३)
“विपुल गुरुपत्नीके शरीरको स्तम्भित करके उसकी रक्षामें संलग्न हो वहीं निवास करने लगे। परंतु रुचिको अपने शरीरमें उनके आनेका पता न चला ।। यं काल॑ नागतो राजन् गुरुस्तस्य महात्मन: । क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं काल॑ सो5भ्यरक्षत,“राजन! जबतक महात्मा विपुलके गुरु यज्ञ पूरा करके अपने घर नहीं लौटे तबतक विपुल इसी प्रकार अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा करते रहे”
yaṃ kālaṃ nāgato rājan gurus tasya mahātmanaḥ | kratuṃ samāpya svagṛhaṃ taṃ kālaṃ so ’bhyarakṣata ||
ภีษมะกล่าวว่า “ข้าแต่พระราชา ตราบใดที่พระอาจารย์ผู้ยิ่งใหญ่ยังมิได้กลับสู่เรือนของตน หลังเสร็จสิ้นพิธียัญ ตลอดกาลนั้นเอง วิปุละยังคงเฝ้าระวังอยู่ ณ ที่นั้น เพื่อพิทักษ์ภรรยาของอาจารย์”
भीष्म उवाच