Aṣṭāvakra–Strī-saṃvāda: Dhṛti, hospitality, and a dispute on autonomy
व्यपदिश्य महर्षेवँ शयनं व्यवरोहत । स्वागतेनागतां तां तु भगवानभ्यभाषत,थोड़ी ही देरमें वह सरदी लगनेका बहाना करके थरथर काँपती हुई आयी और महर्षिकी शय्यापर आरूढ़ हो गयी। पास आनेपर भगवान् अष्टावक्रने “आइये, स्वागत है' ऐसा कहकर उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया
นางอ้างมหาฤๅษีเป็นเหตุแล้วขึ้นสู่ที่บรรทม; ครั้นนางมาถึง พระผู้เป็นที่เคารพก็ตรัสต้อนรับว่า “ยินดีต้อนรับ”
सअद्टावक्र उवाच