Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति । आधिभिव्यधिभिश्रैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि,माण्डव्य बोले--नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया। वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझसे कहा--“विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोतक जीवित रहोगे। तुम्हारे शरीरमें इस शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी। तुम आधि-व्याधिसे मुक्त हो जाओगे
rujā śūlakṛtā caiva na te vipra bhaviṣyati | ādhibhir vyādhibhiś caiva varjitas tvaṃ bhaviṣyasi ||
มาณฑวยะกล่าวว่า “โอ พราหมณ์ ความเจ็บปวดที่เกิดจากหลักเสียบจะไม่เป็นของท่าน และท่านจักพ้นจากความทุกข์ทางใจและโรคภัยทางกายทั้งปวง”
माण्डव्य उवाच