Chapter 2: Sudarśana Upākhyāna — Atithi-Dharma and the Conquest of Mṛtyu
Gṛhastha-Vrata
उच्छिष्टास्मीति मन््वाना लज्जिता भर्तुरिव च । तूष्णी भूताभवत् साध्वी न चोवाचाथ किंचन,परंतु ओधवतीने उस समय अपने पतिको कोई उत्तर नहीं दिया। अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणने अपने दोनों हाथोंसे उसे छू दिया था। इससे वह सती-साध्वी पतिव्रता अपनेको दूषित मानकर अपने स्वामीसे भी लज्जित हो गयी थी; इसीलिये वह साध्वी चुप हो गयी। कुछ भी बोल न सकी
ucchiṣṭāsmīti manvānā lajjitā bhartur iva ca | tūṣṇī bhūtābhavat sādhvī na covācātha kiñcana ||
นางคิดว่า “เรากลายเป็นมลทินแล้ว” และละอายต่อหน้าสามีประหนึ่งได้กระทำผิด สตรีผู้มีศีลนั้นจึงนิ่งเงียบ และมิได้กล่าวสิ่งใดเลย
भीष्म उवाच