Shloka 8

देवासुरगुरुदेव: सर्वभूतनमस्कृत: । अचिन्त्यो<थाप्यनिर्देश्य: सर्वप्राणो ह्ययोनिज:,(देवता और ऋषि आदिके वंशकी नामावली इस प्रकार है--) सर्वभूतनमस्कृत, देवासुरगुरु, अचिन्त्य, अनिर्देश्य सबके प्राणस्वरूप और अयोनिज (स्वयम्भू) जगदीश्वर पितामह भगवान्‌ ब्रह्माजी, उनकी पत्नी सती सावित्री देवी, वेदोंके उत्पत्तिस्थान जगत्कर्ता भगवान्‌ नारायण, तीन नेत्रोंवाले उमापति महादेव, देवसेनापति स्कन्द, विशाख, अग्नि, वायु, प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य, शचीपति इन्द्र, यमराज, उनकी पत्नी धूमोर्णा, अपनी पत्नी गौरीके साथ वरुण, ऋद्धिसहित कुबेर, सौम्य स्वभाववाली देवी सुरभी गौ, महर्षि विश्रवा, संकल्प, सागर, गंगा आदि नदियाँ, मरुठ्रण, तपः:सिद्ध वालखिल्य ऋषि, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, तुम्बुरु, चित्रसेन, विख्यात देवदूत, महासौभाग्यशालिनी देवकन्याएँ, दिव्य अप्सराओंके समुदाय, उर्वशी, मेनका, रम्भा, मिश्रकेशी, अल्म्बुषा, विश्वाची, घृताची, पंचचूडा और तिलोत्तमा आदि दिव्य अप्सराएँ, बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, अश्विनीकुमार, पितर, धर्म, शास्त्रज्ञान, तपस्या, दीक्षा, व्यवसाय, पितामह, रात, दिन, मरीचिनन्दन कश्यप, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, बुध, राहु, शनैश्वर, नक्षत्र, ऋतु, मास, पक्ष, संवत्सर, विनताके पुत्र गरुड़, समुद्र, कद्रूके पुत्र सर्पगण, शतद्गु, विपाशा, चन्द्रभागा, सरस्वती, सिन्धु, देविका, प्रभास, पुष्कर, गंगा, महानदी, वेणा, कावेरी, नर्मदा, कुलम्पुना, विशल्या, करतोया, अम्बुवाहिनी, सरयू, गण्डकी, लाल जलवाला महानद शोणभद्र, ताम्रा, अरुणा, वेत्रवती, पर्णाशा, गौतमी, गोदावरी, वेण्या, कृष्णवेणा, अद्रिजा, दृषद्वती, कावेरी, चक्षु, मन्दाकिनी, प्रयाग, प्रभास, पुण्यमय नैमिषारण्य, जहाँ विश्वेश्वरका स्थान है वह विमल सरोवर, स्वच्छ सलिलसे युक्त पुण्यतीर्थ कुरुक्षेत्र, उत्तम समुद्र, तपस्या, दान, जम्बूमार्ग, हिरण्वती, वितस्ता, प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति वेदवती, मालवा, अश्ववती, पवित्र भूभाग, गंगाद्वार (हरिद्वार), ऋषिकुल्या, समुद्रगामिनी पवित्र नदियाँ, पुण्यसलिला चर्मण्वती नदी, कौशिकी, यमुना, भीमरथी, महानदी बाहुदा, माहेन्द्रवाणी, त्रिदिवा, नीलिका, सरस्वती, नन्‍्दा, अपरनन्दा, तीर्थभूत महान्‌ हृद, गया, फल्गुतीर्थ, देवताओंसे युक्त धर्मारण्य, पवित्र देवनदी, तीनों लोकोंमें विख्यात, पवित्र एवं सर्वपापनाशक कल्याणमय ब्रह्मनिर्मित सरोवर (पुष्करतीर्थ)) दिव्य ओषधियोंसे युक्त हिमवान्‌ पर्वत, नाना प्रकारके धातुओं, तीर्थों, औषधोंसे सुशोभित विन्ध्यगिरि, मेरु, महेन्द्र, मलय, चाँदीकी खानोंसे युक्त श्वेतगिरि, शृंगवान्‌, मन्दर, नील, निषध, दर्दुर, चित्रकूट, अजनाभ, गन्धमादन पर्वत, पवित्र सोमगिरि तथा अन्यान्य पर्वत, दिशा, विदिशा, भूमि, सभी वृक्ष, विश्वेदेव, आकाश, नक्षत्र और ग्रहगण--ये सदा हमारी रक्षा करें तथा जिनके नाम लिये गये हैं और जिनके नहीं लिये गये हैं, वे सम्पूर्ण देवता हमलोगोंकी रक्षा करते रहें

bhīṣma uvāca |

devāsuragurudevaḥ sarvabhūtanamaskṛtaḥ |

acintyo 'thāpy anirdeśyaḥ sarvaprāṇo hy ayonijaḥ ||

พระองค์ทรงเป็นครูผู้เป็นเทพแม้แก่เทวดาและอสูร เป็นที่นอบน้อมของสรรพสัตว์ ทรงเกินคาดคิดและเกินถ้อยคำจะพรรณนา ทรงเป็นลมหายใจแห่งสรรพชีวิต และทรงอโยนิชะ—มิได้เกิดจากครรภ์ เป็นผู้ดำรงอยู่ด้วยตนเอง

देवासुरगुरुदेवःthe divine lord who is the guru of gods and asuras
देवासुरगुरुदेवः:
Karta
TypeNoun
Rootदेवासुरगुरुदेव
FormMasculine, Nominative, Singular
सर्वभूतनमस्कृतःrevered by all beings
सर्वभूतनमस्कृतः:
Karta
TypeAdjective
Rootसर्वभूतनमस्कृत
FormMasculine, Nominative, Singular
अचिन्त्यःinconceivable
अचिन्त्यः:
Karta
TypeAdjective
Rootअचिन्त्य
FormMasculine, Nominative, Singular
अथand/then
अथ:
TypeIndeclinable
Rootअथ
अपिalso/even
अपि:
TypeIndeclinable
Rootअपि
अनिर्देश्यःindescribable/undefinable
अनिर्देश्यः:
Karta
TypeAdjective
Rootअनिर्देश्य
FormMasculine, Nominative, Singular
सर्वप्राणःthe life-breath of all (the universal vital principle)
सर्वप्राणः:
Karta
TypeNoun
Rootसर्वप्राण
FormMasculine, Nominative, Singular
हिindeed/for
हि:
TypeIndeclinable
Rootहि
अयोनिजःunborn from a womb; self-born
अयोनिजः:
Karta
TypeAdjective
Rootअयोनिज
FormMasculine, Nominative, Singular

भीष्म उवाच

B
Bhishma (Bhīṣma)
D
Devas (gods)
A
Asuras (anti-gods/demons)
S
Sarvabhūta (all beings)
T
The self-existent unborn Lord (ayonija, acintya, anirdeśya, sarvaprāṇa)

Educational Q&A

The verse teaches reverent recognition of the Supreme as beyond thought and speech, yet as the sustaining life of all beings. Ethically, it grounds dharma in humility: one should act and speak with awareness that the highest reality transcends ego and conceptual grasp, while still supporting all life.

Bhishma is speaking in Anushasana Parva and begins an invocation/praise: he characterizes the supreme divine principle as worshipped by all, inconceivable, indescribable, the life of all, and unborn. In the surrounding passage (as reflected in the Gita Press context), this functions as a protective benediction and a framing for listing revered divine and sacred entities.