अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम् । प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
yaṃ ca vedavido vedyaṃ vedānte ca pratiṣṭhitam | prāṇāyāmaparā nityaṃ yaṃ viśanti japanti ca ||
วายุกล่าวว่า “สภาวะนั้นเป็นสิ่งที่ผู้รู้พระเวทพึงรู้ และตั้งมั่นอยู่ในเวทานตะ ผู้ปฏิบัติที่มุ่งมั่นในปราณายามะย่อมเข้าสู่ตัตตวะอันนิรันดร์นั้นเนืองนิตย์ ทั้งภาวนาและสวดจปะอยู่กับสิ่งนั้น”
वायुदेव उवाच
The verse identifies a single supreme, eternal Reality as the highest object of knowledge affirmed by the Vedas and clarified in Vedānta, and says that disciplined yogins—especially those devoted to prāṇāyāma and mantra-japa—contemplate it and ultimately ‘enter’ or merge into it, implying liberation through inner realization rather than external gain.
Vāyu is speaking in a didactic context within the Anuśāsana Parva, describing the recognized goal of Vedic and yogic practice: the Vedāntic Principle that sages meditate upon, recite, and realize through yogic discipline.