यं लब्ध्वा परमं लाभ॑ नाधिकं मन्यते बुध: । यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम्,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
yaṁ labdhvā paramaṁ lābhaṁ nādhikaṁ manyate budhaḥ | yāṁ sūkṣmāṁ paramāṁ prāptiṁ gacchann avyayam akṣayam ||
วายุกล่าวว่า “เมื่อได้บรรลุพระองค์แล้ว บัณฑิตย่อมไม่เห็นว่ามีกำไรใดสูงยิ่งกว่า และเมื่อเข้าถึงความสำเร็จอันละเอียดและสูงสุดนั้น เขาย่อมไปสู่ภาวะอันไม่เสื่อมและไม่สูญสลาย”
वायुदेव उवाच
The verse teaches that realization of the highest, subtle Reality is the unsurpassed gain: once attained, no other achievement is considered greater, because it leads to the imperishable, undecaying state (mokṣa).
Vāyu is speaking in Anuśāsana Parva, describing the nature of the supreme attainment sought by the wise—an ultimate realization that transcends ordinary worldly gains and culminates in an imperishable state.