धर्मनिन्दा–धर्मोपासनाफलम् तथा साध्वाचारलक्षणम्
Fruits of Disparaging vs. Observing Dharma; Marks of Good Conduct
वृथामांसं न भुञ्जीत शूद्रो वैश्यत्वमृच्छति । शूद्र अपने सभी कर्मोको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे। स्वयं शुद्ध रहकर शुद्ध पुरुषोंका ही अन्वेषण करे। अतिथि-सत्कार और कुट॒म्बीजनोंके भोजनसे बचे हुए अन्नका ही आहार करे और मांस न खाय। इस नियमसे रहनेवाला शूद्र (मृत्युके पश्चात् पुण्यकर्मोंका फल भोगकर) वैश्ययोनिमें जन्म लेता है ।। ऋतवागनहंवादी निर्दन्न्दधः शमकोविद:,वैश्य सत्यवादी, अहंकारशून्य, निर्द्धन्द्, शान्तिके साधनोंका ज्ञाता, स्वाध्यायपरायण और पवित्र होकर नित्य यज्ञोंद्वारा यजन करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्म॒णोंका सत्कार करते हुए समस्त वर्णोकी उन्नति चाहे। गृहस्थके व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन दो ही समय भोजन करे। यज्ञशेष अन्नका ही आहार करे। आहारपर काबू रखे। सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग दे। अहंकारशून्य होकर विधिपूर्वक आहुति देते हुए अग्निहोत्र कर्मका सम्पादन करे। सबका आतिथ्य-सत्कार करके अवशिष्ट अन्नका स्वयं भोजन करे। त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रोच्चारणपूर्वक परिचर्या करे। ऐसा करनेवाला वैश्य द्विज होता है। वह वैश्य पवित्र एवं महान क्षत्रियकुलमें जन्म लेता है
vṛthā-māṁsaṁ na bhuñjīta śūdro vaiśyatvam ṛcchati |
พระมหेशวรตรัสว่า “ศูทรพึงไม่บริโภคเนื้อโดยไร้เหตุอันควร; เมื่อดำรงตนตามข้อวัตรเช่นนี้ ย่อมบรรลุฐานะไวศยะ”
श्रीमहेश्वर उवाच
Avoiding purposeless/illicit meat-eating is presented as part of a broader discipline of righteous living; such regulated conduct is said to lead to higher social-spiritual attainment (vaiśyatva).
Śrī Maheśvara is instructing on duties and conduct; this verse states a specific rule (not eating meat 'in vain') and links ethical restraint with the result of attaining Vaiśya status.