अत्रेः तपोबलप्रकाशः तथा च्यवनस्य सोमाधिकारः
Atri’s Illumination by Tapas; Cyavana and Soma-Entitlement
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भोज्याभोज्यान्नकथन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १३५ ॥। षट्त्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्षित्त युधिषछ्िर उवाच उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाभोज्याश्व् सर्वश: । अत्र मे प्रश्रसंदेहस्तन्मे वद पितामह,युधिष्ठिने कहा--पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये
yudhiṣṭhira uvāca | uktās tu bhavatā bhojyās tathābhōjyāś ca sarvaśaḥ | atra me praśna-saṃdehas tan me vada pitāmaha ||
ยุธิษฐิระกล่าวว่า “ข้าแต่ปิตามหะ ท่านได้อธิบายโดยพิสดารแล้วว่า สิ่งใดควรรับและสิ่งใดไม่ควรรับ แต่ในเรื่องเดียวกันนี้ ความสงสัยได้เกิดขึ้นในใจข้าพเจ้า ขอท่านโปรดคลี่คลายให้ด้วย”
युधिषछ्िर उवाच