दानशील-समाचारः, सत्कारः, अहिंसा च
Umā–Maheśvara Saṃvāda
इदं चैवापरं गुह्ुमप्रशस्तं निबोधत । अग्नेस्तु वृषलो नेता हविर्मूढाश्व योषित:,अब यह दूसरी उस गोपनीय बातको सुनो, जो उत्तम नहीं है अर्थात् निन्दनीय है। यदि शूद्र किसी द्विजके अग्निहोत्रकी अग्निको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाता है तथा मूर्ख स्त्रियाँ यज्ञ-सम्बन्धी हविष्यको ले जाती हैं--इस कार्यको जो धर्म ही समझता है, वह अधर्मसे लिप्त होता है। उसके ऊपर अग्नियोंका कोप होता है और वह शूद्रयोनिमें जन्म लेता है
idaṃ caivāparaṃ guhyaṃ apraśastaṃ nibodhata | agnestu vṛṣalo netā havirmūḍhāśva yoṣitaḥ ||
บัดนี้จงรู้ความลับอีกประการหนึ่ง ซึ่งมิใช่สิ่งน่าสรรเสริญ หากเป็นสิ่งน่าติเตียน—หากศูทรเป็นผู้หามไฟศักดิ์สิทธิ์แห่งอัคนิโหตรของทวิชจากที่หนึ่งไปสู่อีกที่หนึ่ง และหากสตรีผู้เขลาเป็นผู้หามเครื่องบูชา (หวิส) แห่งยัญพิธี; ผู้ใดกลับเห็นว่านั่นคือ ‘ธรรม’ ผู้นั้นย่อมเปื้อนด้วยอธรรม
धौग्य उवाच