Anuśāsana-parva Adhyāya 112: Dharma as the sole companion; karmic witnesses; rebirth sequences
Bṛhaspati–Yudhiṣṭhira Saṃvāda
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते । स स्नातो यो दमस्नात: स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:,शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है
การทำให้กายเปียกด้วยน้ำเพียงอย่างเดียวไม่เรียกว่า “ส্নาน” ผู้ที่ส্নานแท้จริงคือผู้ที่อาบใน “ดมะ” คือการสำรวมใจและอินทรีย์ ผู้นั้นแลบริสุทธิ์ทั้งภายนอกและภายใน
भीष्म उवाच