Āstīka’s Commission and Approach to Janamejaya’s Sarpa-satra (आस्तीक-प्रेषणं यज्ञप्रवेशोपक्रमश्च)
ततो राजा क्षुच्छुमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत् स्थितम् | मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गत:,वे काठकी भाँति चुपचाप, निश्चेष्ट एवं अविचल भावसे स्थित थे। यह देख भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल हुए राजा परीक्षित्को उन मौनव्रतधारी शान्त महर्षिपर तत्काल क्रोध आ गया
ครั้งนั้น พระราชาผู้ถูกความหิว กระหาย และความอ่อนล้าบีบคั้น เห็นฤๅษีองค์นั้นยืนนิ่งดุจเสา ถือพรตแห่งความเงียบ และสงบเย็น จึงพลันตกอยู่ใต้อำนาจแห่งโทสะในทันที
जनमेजय उवाच