Drupada’s Putrakāmeṣṭi: The Sacrificial Birth of Dhṛṣṭadyumna and Kṛṣṇā
गुहाकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान् पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी
vaiśampāyana uvāca | guhākānāṁ nivāseṣu tāpasāyataneṣu ca | sarvartuphalaramyeṣu mānaseṣu sarassu ca ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า— ณ ที่พำนักของเหล่าคุหยะกะ ณ อาศรมของนักตบะ ณ สระและบึงที่งามด้วยผลไม้ทุกฤดูกาล ตลอดจนทะเลสาบศักดิ์สิทธิ์มานัสโรวร หิฑิมพาแปลงกายเป็นรูปโฉมงามยิ่ง ประดับเครื่องอลังการครบถ้วน ทำให้ภีมเสน โอรสแห่งปาณฑุ เปี่ยมสุขอยู่เสมอ นางเคลื่อนไหวรวดเร็วประหนึ่งจิต จึงพาเขารื่นรมย์ขณะท่องไปจากแห่งหนึ่งสู่อีกแห่งหนึ่ง
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights how desire and companionship can unfold within a broader moral landscape: even amid romance and pleasure, the narrative situates the couple’s movement through sacred and ascetic spaces (hermitages, holy lakes), implicitly reminding the listener that human impulses occur under the gaze of dharma and within a world shared with sages and divine beings.
After forming a bond with Bhīma, Hidimbā takes on a beautiful form, adorns herself, and accompanies him swiftly across many delightful places—Guhyaka regions, ascetics’ hermitages, and lakes such as Mānasarovar—bringing him pleasure as they roam.