Adhyāya 123 — Droṇa’s Pedagogy: Arjuna’s Preeminence, Ekalavya’s Self-Training, and the Bhāsa-Lakṣya Trial
सर्वेषां बलिनां श्रेष्ठो जातो5यमिति भारत । इदमत्यद्भुतं चासीज्जातमात्रे वृकोदरे,वायुदेवसे भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमका जन्म हुआ। जनमेजय! उस महाबली पुत्रको लक्ष्य करके आकाशवाणीने कहा--“यह कुमार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है। भीमसेनके जन्म लेते ही एक अद्भुत घटना यह हुई कि अपनी माताकी गोदसे गिरनेपर उन्होंने अपने अंगोंसे एक पर्वतकी चट्टानको चूर-चूर कर दिया। बात यह थी कि यदुकुलनन्दिनी कुन्ती प्रसवके दसवें दिन पुत्रको गोदमें लिये उसके साथ एक सुन्दर सरोवरके निकट गयी और स्नान करके लौटकर देवताओंकी पूजा करनेके लिये कुटियासे बाहर निकली। भरतनन्दन! वह पर्वतके समीप होकर जा रही थी कि इतनेमें ही उसको मार डालनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा व्याप्र उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकल आया। देवताओंके समान पराक्रमी कुरुश्रेष्ठ पाण्डुने उस व्याप्रको दौड़कर आते देख धनुष खींच लिया और तीन बाणोंसे मारकर उसे विदीर्ण कर दिया। उस समय वह अपनी विकट गर्जनासे पर्वतकी सारी गुफाको प्रतिध्वनित कर रहा था। कुन्ती बाघके भयसे सहसा उछल पड़ी
sarveṣāṃ balināṃ śreṣṭho jāto ’yam iti bhārata | idam atyadbhutaṃ cāsīj jātamātre vṛkodare ||
โอ ภารตะ! สุรเสียงไร้กายประกาศว่า “เด็กผู้นี้บังเกิดมาเป็นยอดแห่งผู้มีกำลังทั้งปวง” และในขณะเดียวกับที่วฤโกทรประสูติ ก็เกิดเหตุอัศจรรย์ยิ่งนัก
वैशम्पायन उवाच
The verse frames extraordinary strength as a divinely signaled destiny: Bhīma’s might is not merely physical but a foretold quality, suggesting that great capacities carry a larger role within the moral and narrative order (dharma) of the epic.
The narrator reports a heavenly proclamation at Bhīma’s birth, declaring him the foremost among the strong, and introduces that an astonishing event occurred immediately upon his being born.