वैशम्पायन उवाच तमब्रवीद् धर्मराजो विहस्य विराटराजं तु भृशाभितप्तम् । बृहन्नला सारथिक्षेन्नरेन्द्र परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा विराटको बहुत दुःखी देखकर धर्मराज युधिष्ठिरने उनसे हँसकर कहा--“नरेन्द्र! यदि बृहन्नला सारथि है, तो यह विश्वास कीजिये कि शत्रु आज आपकी वे गौएँ नहीं ले जा सकेंगे। उस हितैषी सारथिके सहयोगसे सब कार्य ठीक-ठीक कर लेनेपर आपका पुत्र युद्धमें समस्त राजाओं तथा संगठित होकर आये हुए कौरवोंकी तो बात ही क्या, देवता, असुर, सिद्ध और यक्षोंपर भी निश्चय ही विजय पा सकता है'
vaiśampāyana uvāca
tam abravīd dharmarājo vihasya virāṭarājaṃ tu bhṛśābhitaptam |
bṛhannalā sārathikṣe naraindra pare na neṣyanti tavādya gās tāḥ ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—విరాటరాజు అత్యంత వ్యాకులుడై ఉండటాన్ని చూసి ధర్మరాజు యుధిష్ఠిరుడు నవ్వుతూ అన్నాడు—“నరేంద్రా! బృహన్నలే సారథి అయితే, నిశ్చయంగా ఈ రోజు శత్రువులు నీ గోవులను తీసుకుపోలేరు.”
वैशम्पायन उवाच