अर्जुनोक्तिः—कृष्णं प्रति पुरुषकार‑कर्म‑विचारः
Arjuna’s Address to Krishna: Agency, Action, and Immediate Counsel
दैवमप्यकृतं कर्म पौरुषेण विहन्यते । शीतमुष्णं तथा वर्ष क्षुत्पिपासे च भारत,भारत! दैवकृत कार्य भी समाप्त होनेसे पहले पुरुषार्थद्वारा नष्ट कर दिया जाता है। जैसे शीतका निवारण वस्त्रसे, गरमीका व्यजनसे, वर्षाका छत्रसे और भूख-प्यासका निवारण अन्न और जलसे हो जाता है
ఓ భారతా! దైవకృతమైన కార్యమూ పూర్తికాకముందే పురుషార్థంతో చెదరగొట్టబడుతుంది. వస్త్రంతో చలిని, వ్యజనంతో వేడిని, ఛత్రంతో వర్షాన్ని, అన్నం-నీటితో ఆకలి దాహాలను నివారించినట్లే.
भीमसेन उवाच