Śikhaṇḍinī’s Disclosure, Drupada’s Counsel, and the Petition to Yakṣa Sthūṇākarṇa
Udyoga Parva 192
अप्रधृष्यमनावार्यमुद्धूतमिव सागरम् । सेनासागरमक्षोभ्यमपि देवैर्महाहवे,“गंगानन्दन! यह जो पाण्डवोंकी सेना युद्धके लिये उद्यत है। इसमें बहुत-से पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार भरे हुए हैं। यह सेना बड़े-बड़े महारथियों एवं उनके विशाल रथोंसे व्याप्त है। लोकपालोंके समान महापराक्रमी एवं महाधनुर्धर भीमसेन, अर्जुन और धृष्टद्युम्न आदि वीर इस सेनाकी रक्षा करते हैं। यह उछलती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रकी भाँति दुर्धर्ष प्रतीत होती है। इसे आगे बढ़नेसे रोकना असम्भव है तथा बड़े-बड़े देवता भी इस महान् युद्धमें इस सैन्य-समुद्रको क्षुब्ध नहीं कर सकते
sañjaya uvāca |
apradhṛṣyam anāvāryam uddhūtam iva sāgaram |
senāsāgaram akṣobhyam api devair mahāhave ||
సంజయుడు అన్నాడు—గంగానందనా! పాండవుల సేన యుద్ధానికి సిద్ధమై ఉంది; ఉప్పొంగే సముద్రంలా దుర్ధర్షం, అప్రధృష్యం, ఆపలేనిది. ఇది సేనాసముద్రమే; మహాయుద్ధంలో దేవతలకైనా దీనిని కలవరపెట్టడం సాధ్యం కాదు.
संजय उवाच