गालवस्य विषादः तथा विष्णुप्रयाणम्
Gālava’s Despair and Resolve to Seek Viṣṇu
प्रतिगृह्म ततो धर्मस्तथैवोष्णं तथा नवम् | भुक््त्वा प्रीतो5स्मि विप्ररषे तमुक्त्वा स मुनिर्गतः,उन्होंने देखा कि परम बुद्धिमान महर्षि विश्वामित्र केवल वायु पीकर रहते हुए सिरपर भोजनपात्र रखे खड़े हैं। यह देखकर धर्मने वह भोजन ले लिया। वह अन्न उसी प्रकार तुरंतकी तैयार की हुई रसोईके समान गरम था। उसे खाकर वे बोले--“ब्रह्मर्ष! मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ।! ऐसा कहकर मुनिवेषधारी धर्मदेव चले गये
pratigṛhya tato dharmas tathaivoṣṇaṃ tathā navam | bhuktvā prīto 'smi viprarṣe tam uktvā sa munir gataḥ ||
అప్పుడు ధర్ముడు దానిని స్వీకరించాడు; ఆ అన్నం అలాగే వేడిగా, అలాగే కొత్తగా—ఇప్పుడే వండినట్లుగా ఉంది. తిని ఆయన అన్నాడు—“ఓ బ్రహ్మర్షీ, నేను నీపై అత్యంత ప్రసన్నుడను.” అని చెప్పి మునివేషధారి ధర్మదేవుడు వెళ్లిపోయాడు.
नारद उवाच