Varṇa-dharma and Rājadharma: Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Normative Outline (वर्णधर्म-राजधर्म-प्रश्नोत्तरम्)
मड़लालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया । आहारयोजन चैव नित्यमास्तिक्यमेव च,अपने अधिकारमें आये हुए देशोंमें शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषोंका सत्कार करना, विद्वानोंके साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होमकी विधिको जानना, माड़लिक वस्तुओंका स्पर्श करना, शरीरको वस्त्र और आभूषणोंसे सजाना, भोजनकी व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना--इन सब बातोंका भी उस ग्रन्थमें वर्णन है
maṇḍalālambhanaṃ caiva śarīrasya pratikriyā | āhārayojanaṃ caiva nityam āstikyam eva ca ||
భీష్ముడు పలికెను—ఆ గ్రంథంలో రాజ్యమండలాన్ని ఆధారంగా నిలబెట్టడం (సుదృఢీకరణ), శరీరానికి తగిన పరిచర్య, ఆహారాన్ని క్రమబద్ధంగా ఏర్పాటు చేయడం, మరియు నిత్య ఆస్తికత్వం (శ్రద్ధాధారిత దృష్టి) నిలుపుకోవడం—ఇవీ వివరించబడ్డాయి।
भीष्म उवाच