Śānti-parva Adhyāya 44 — Post-War Reassignment of Residences and Restorative Consolation (शान्तिपर्व अध्याय ४४)
प्रददौ सहदेवाय संततं प्रियकारिणे । मुमुदे तच्च लब्ध्वासौ कैलासं धनदो यथा,दुर्मुखका श्रेष्ठ भवन तो और भी सुन्दर था। उसे सुवर्णसे सुसज्जित किया गया था। खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाली सुन्दर स्त्रियोंकी शय्याओंसे भरा हुआ वह भवन युधिष्ठिरने सदा अपना प्रिय करनेवाले सहदेवको दिया। जैसे कुबेर कैलासको पाकर संतुष्ट हुए थे, उसी प्रकार उस सुन्दर महलको पाकर सहदेवको बड़ी प्रसन्नता हुई
vaiśampāyana uvāca | pradadau sahadevāya satataṁ priyakāriṇe | mumude tac ca labdhvāsau kailāsaṁ dhanado yathā ||
వైశంపాయనుడు పలికెను— యుధిష్ఠిరుడు ఎల్లప్పుడూ తనకు ప్రీతికరంగా ఉండే సహదేవునికి ఆ భవనాన్ని ఇచ్చెను. దానిని పొందిన సహదేవుడు, ధనదుడైన కుబేరుడు కైలాసాన్ని పొందినట్లు, పరమానందించాడు.
वैशम्पायन उवाच