इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उज्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३५९ ॥/ ऑपन-माज बछ। अकाल षष्ट्याधिकत्रिशततमो< ध्याय: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना नाग उवाच अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं॑ समनुपश्यसि । मानुषं केवल विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते,नागने पूछा--पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता?
Nāga uvāca: atha brāhmaṇarūpeṇa kaṃ taṃ samanupaśyasi | mānuṣaṃ kevalaṃ vipraṃ devaṃ vātha śucismite ||
నాగుడు అన్నాడు—పవిత్రమైన సౌమ్యస్మితముగల దేవీ! బ్రాహ్మణరూపంలో నీవు అక్కడ ఎవరిని దర్శించితివి? ఆ బ్రాహ్మణుడు కేవలం మనుష్యుడా, లేక నిజంగా దేవుడా?
नाग उवाच