धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् | ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठ पश्य नारद खेचरम्,“आठ प्रकारके ऐश्वर्य भी यहाँ एक ही जगह साकाररूपसे प्रकट हैं, इन्हें देखो। श्री, लक्ष्मी, कीर्ति, पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा वेदमाता सरस्वतीदेवी भी मेरे भीतर विराजमान हैं, उन सबका दर्शन करो। नारद! ये नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी ध्रुव दिखायी दे रहे हैं, इनकी ओर भी दृष्टिपात करो
vedānāṁ mātaraṁ paśya matsthāṁ devīṁ sarasvatīm | dhruvaṁ ca jyotiṣāṁ śreṣṭha paśya nārada khecaram ||
భీష్ముడు అన్నాడు—నా లోపల నివసిస్తున్న వేదమాత దేవి సరస్వతిని చూడు. ఓ నారదా, జ్యోతిష్యాలలో శ్రేష్ఠమైన ఆకాశచారి ధ్రువుని కూడా చూడు.
भीष्म उवाच