एकान्तिधर्म-प्रश्नः (Inquiry into Ekāntin Dharma) / The Origin and Practice of Single-Pointed Nārāyaṇa-Centered Discipline
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३ श्लोक हैं) #द-2८5- | पर ॥ #* पजञ्चत्रिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसड्भ भीष्म उवाच स एवमुक्तो द्विपदां वरिष्ठो नारायणेनोत्तमपूरुषेण । जगाद वाक्यं द्विपदां वरिष्ठ नारायणं लोकहिताधिवासम्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान् नारायणने जब पुरुषप्रवर नारदजीसे इस प्रकार कहा, तब वे लोकहितके आश्रयभूत पुरुषाग्रगण्य भगवान् नारायणसे यों बोले
bhīṣma uvāca | sa evam ukto dvipadāṁ variṣṭho nārāyaṇenottama-pūruṣeṇa | jagāda vākyaṁ dvipadāṁ variṣṭa nārāyaṇaṁ loka-hitādhivāsam ||
భీష్ముడు పలికెను—యుధిష్ఠిరా! పురుషోత్తముడైన భగవాన్ నారాయణుడు నరశ్రేష్ఠుడైన నారదునితో ఈ విధంగా పలికినప్పుడు, పురుషప్రవరుడైన నారదుడు లోకహితాశ్రయుడైన ఆ నారాయణునికి ప్రత్యుత్తరంగా ఇలా పలికెను।
भीष्म उवाच