नरनारायण-नारदसंवादः
Nara-Nārāyaṇa–Nārada Discourse on Vision, Elements, and Entry into Vāsudeva
अपन का बा | अप्-#-राल जा एकत्रिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: नारदजीका शुकदेवको कर्मफल-प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा शुकदेवजीका सूर्यलोकमें जानेका निश्चय नारद उवाच सुखदुः:खविपर्यासो यदा समनुपद्यते । नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नापि पौरुषम्,नारदजी कहते हैं--शुकदेव! जब मनुष्य सुखको दुःख और दुःखको सुख समझने लगता है, उस समय बुद्धि, उत्तम नीति और पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाता
nārada uvāca | sukhaduḥkhaviparyāso yadā samanupadyate | nainaṃ prajñā sunītaṃ vā trāyate nāpi pauruṣam ||
నారదుడు పలికెను—ఓ శుకదేవా! సుఖం-దుఃఖం గురించిన బోధ విపరీతమై, మనిషి సుఖాన్ని దుఃఖంగా, దుఃఖాన్ని సుఖంగా భావించునప్పుడు—అతనిని ప్రজ্ঞ గానీ, సునీతి గానీ, పురుషప్రయత్నం గానీ రక్షించలేవు.
नारद उवाच